वो जो हैं न वो इश्क़ को इनक़लाब से जोड़कर लिखते हैं. वस्ल की राह तकते-तकते ज़िन्दगी के फ़लसफ़ें बुनते रहते हैं.

जिनकी नज़्मों की संजीदगी इस कदर थी कि उन्हें 'शायर-ए-इनक़लाब' कहा जाने लगा. वो हैं 'जोश मलीहाबादी', जिनके हर मुशायरे में पंडित नेहरू जाया करते थे.

5 दिसंबर 1894 को जन्मे जोश अपने ज़माने के बेहतरीन शायर थे. उन्होंने कई नये लफ़्ज़ बनाये और कई पुराने लफ़्जों को नया रूप दिया. उनकी आत्मकथा, 'यादों की बारात' को ऊर्दू की बेहतरीन जीवनी कहा जाता है.

1958 तक वो भारत के बाशिंदे रहे, इसके बाद वो पाकिस्तान चले गये. फ़ैज अहमद फ़ैज़ से उनकी गहरी दोस्ती थी. अपनी ज़िन्दगी की आख़िरी सांसें उन्होंने 22 फरवरी, 1982 को इस्लामाबाद में ही ली.

इश्क़, इनक़लाब ज़िन्दगी की क़िताब से ली हुईं शायर-ए-इनक़लाब की 15 नज़्में:

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