मुहावरे हमारी बातचीत का हिस्सा होते हैं, जब हम अपनी बात को कम शब्दों में ज़्यादा प्रभावी ढंग से बोलना चाहते हैं, तो ये मुहावरे बहुत काम आते हैं. ये हमें किताबों में ही ज़्यादा मिलते हैं, लेकिन पढ़ने की आदत कम होने की वजह से इन्हें याद रखना आसान नहीं होता है. अब इन मुहावरों की जगह फ़िल्मों के डायलॉग्स ने ले ली है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि हम फ़िल्मी डायलॉग्स को जल्दी भूलते नहीं. बॉलीवुड फ़िल्मों के कुछ ऐसे ही डायलॉग्स आम ज़िंदगी में लोग अकसर बोलते हैं. इन्हीं में से कुछ फ़ेमस डायलॉग्स आज हम आपके लिए ले कर आये हैं.

1. रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप होते हैं.

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'शहंशाह' (1988) मूवी का ये डायलॉग हिंदी फ़िल्मों के सारे डायलॉग्स का बाप है. जे.के. वर्मा (अमरीश पुरी) के सवाल का ज़वाब देने का शहंशाह (अमिताभ बच्चन) का ये अंदाज़ दिल को छू लेता है.

2. बड़े-बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं.

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जब कोई ग़लती के लिए माफ़ी मांगे और सामने वाला उसे माफ़ करना चाहे, तो 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' (1995) की ये लाइन अकसर लोगों को याद आ जाती है. इस फ़िल्म में सिमरन (काजोल) जब राज (शाहरुख़ खान) से माफ़ी मांगती है, तो इसके ज़वाब में राज ये लाइन उससे बोलता है.

3. Don't Underestimate The Power Of A Common Man.

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एक आम इंसान की ताकत को न पहचानने वालों को 'चेन्नई एक्सप्रेस' (2013) मूवी का ये डायलॉग, सही ज़वाब है. इस मूवी में राहुल (शाहरुख़ खान), मीनालक्ष्मी (दीपिका पादुकोण) को बार-बार ये लाइन कहता है.

4. मेरे पास मां है.

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कोई कभी पूछे कि तुम्हारे पास क्या है, तो 'दीवार' (1975) फ़िल्म के इस डायलॉग से बेहतर जवाब कुछ नहीं है. विजय (अमिताभ बच्चन) के अहंकार से पूछे गए सवाल पर रवि (शशि कपूर) का ये ज़वाब विजय को निःशब्द कर देता है.

5. हम शरीफ़ क्या हुए, पूरी दुनिया ही बदमाश बन गई.

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किसी के सही कैरेक्टर का पता न होने पर उसके सीधा होने का जब कोई फ़ायदा उठाता है, तो उस समय ये लाइन ही दिमाग में आती है. इसी तरह के सीन में 'दिलवाले' (2015) मूवी में राज (शाहरुख़ खान) अपने दोस्तों से ये बात कहता है.

6. All Is Well.

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मुसीबत में भी हिम्मत देने वाला ये डायलॉग, बॉलीवुड की सबसे सफ़ल फ़िल्म '3 इडियट्स' (2009) का है. रैंचो (आमिर खान) जब कभी परेशान होता, तो ख़ुद से और अपने दोस्तों से यही बात कहता.

7. बेटा, तुमसे ना हो पाएगा.

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'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर 2' (2012) की सफ़लता का कारण इस फ़िल्म के डायलॉग्स थे. इन्हीं डायलॉग्स में सबसे फ़ेमस था- 'बेटा, तुमसे ना हो पाएगा'. रामाधीर सिंह (तिग्मांशु धुलिया) अपने बेटे जेपी सिंह (सत्य आनंद) को समझाते हुए यही लाइन बोलता है.

8. जा सिमरन जा...जा जी ले अपनी ज़िंदगी

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बॉलीवुड की सदाबहार फ़िल्मों में से एक 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' (1995) की ये लाइन फ़िल्म की तरह ही अमर हो गयी. बलदेव सिंह चौधरी (अमरीश पुरी) अपनी बेटी सिमरन (काजोल) को राज (शाहरुख़ खान) के साथ ज़िंदगी बिताने के लिए इज़ाजत देते हुए ये लाइन कहते हैं.

9. कभी-कभी जीतने के लिए, कुछ हारना पड़ता है और हार कर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं.

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बॉलीवुड का ये डायलॉग असल ज़िंदगी में काफ़ी हिम्मत देता है. हारने के बाद पॉज़ीटिव कैसे रहा जाए, 'बाज़ीगर' (1993) में अजय (शाहरुख़ खान), प्रिया (काजोल) को यही कह कर बताता है.

10. ख़ुश तो आज बहुत होगे तुम

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'दीवार' (1975) फ़िल्म की ये लाइन, भगवान के सामने विजय वर्मा (अमिताभ बच्चन) का गुस्सा ज़ाहिर करने के लिए एकदम सही है.

11. बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लम्बी नहीं.

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'आनंद' (1971) मूवी का ये डायलॉग ज़िंदगी की सीख देता है. आनंद (राजेश खन्ना) जानता है कि वो ज़्यादा दिनों तक ज़िंदा नहीं रहने वाला, फिर भी वो डॉ. भास्कर (अमिताभ बच्चन) को ज़िंदगी के मायने समझाते हुए ये बात कहता है.

12. मैं उड़ना चाहता हूं, दौड़ना चाहता हूं, गिरना भी चाहता हूं...बस रुकना नहीं चाहता.

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बॉलीवुड के बेहतरीन डायलॉग्स में से एक ये डॉयलॉग जितना फ़िल्म के हीरो के लिए लिखा गया था, उतना ही असल ज़िंदगी में किसी बड़े ख़्वाब देखने वाले इंसान के लिए भी है. 'ये जवानी है दीवानी' (2013) में कबीर (रणबीर कपूर) अपनी चाहत बताते हुए नैना (दीपिका पादुकोण) से यही ख़ूबसूरत लाइन कहता है.

13. जिनके अपने घर शीशे के हो, वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते.

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1965 में आई पहली मल्टी स्टारर हिंदी फ़िल्म 'वक़्त' का ये डायलॉग आज भी बॉलीवुड के सदाबहार डायलॉग्स में से एक है. राजा (राज कुमार) का चिनॉय सेठ (रहमान) को धमकी देने का ये अंदाज़ वाकई शानदार था.

14. दोस्ती का एक उसूल है मैडम, दोस्ती में नो सॉरी, नो थैंक्यू.

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दोस्ती में क्या-क्या बातें ज़रूरी होती हैं, 'मैंने प्यार किया' (1989) मूवी में प्रेम (सलमान खान) इस लाइन के ज़रिए बख़ूबी सुमन (भाग्यश्री) को बताता है.

15. पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त.

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हमारी ज़िंदगी में अंत में सब अच्छा ही होता है, यही बात बताता है 'ओम शांति ओम' (2007) का ये डायलॉग. ओम (शाहरुख़ खान) जब अपने दोस्त पप्पू (श्रेयश तलपड़े) के सामने अवॉर्ड पाने के बाद की स्पीच की प्रैक्टिस करता है, तो अंत में यही लाइन बोलता है.

हिंदी फ़िल्मों में ऐसे डायलॉग्स की भरमार है. इनसे ही बॉलीवुड की कई फ़िल्मों को पहचान मिली है.

Article Source: Amuserr