साल 1968, 17 साल की मध्यम वर्गीय परिवार की एक लड़की ने बहुत हिम्मत जुटाकर इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया. अच्छे नंबरों के कारण कॉलेज में दाखिला भी मिल गया. समस्या इसके बाद शुरू हुई, वो लड़की पूरे कॉलेज में अकेली लड़की थी. उस कॉलेज में लेडिज़ टॉयलेट भी नहीं था. वो लड़की कोई और नहीं, सुधा मूर्ति हैं.

सुधा के लिए इंजीनियरिंग के वो कुछ साल आसान नहीं थे. उनके सहपाठी हर उनकी हिम्मत तोड़ने की हर संभव कोशिश करते थे. उन पर कागज़ के हवाईजहाज़ फेंकते थे, जिन पर संदेश लिखे होते. जैसे, 'औरते की जगह या तो रसोई में है या फिर मेडिकल फील्ड में, इंजीनियरिंग में नहीं.'

इन सब समस्याओं के बावजूद सुधा हमेशा अपने कॉलेज में प्रथम आतीं. अपने बारे में ये बातें सुधा ने अपनी किताब, 'Three Thousand Stitches' में लिखी हैं.

Infosys Foundation की चेयरपर्सन हैं सुधा मूर्ति में पैदा हुईं मुर्थी के पिता सर्जन और मां टीचर थे. वो BVB College of Engineering & Technology में पढ़ने वाली पहली महिला छात्र हैं. उन्होंने Indian Institute of Science से कंप्यूटर साइंस में Master of Engineering की.

सुधा देश की पहली महिला इंजीनियर हैं जिन्हें TELCO ने चयनित किया था.

उन्होंने अपनी ज़िन्दगी और अनुभवों पर आधारित कन्नड़ और अंग्रेज़ी में कई किताबें लिखी हैं. उनकी किताब 'How I Taught My Grandmother to Read & Other Stories' का 15 से ज़्यादा भाषाओं में अनुवाद किया गया है.

सुधा मूर्ति ने किताबों में जीने के सलीके बतायें हैं, उन्हीं किताबों में कहीं गईं कुछ बातें जो आपको जीवन की कड़वी हक़ीक़त से रूबरू करवायेंगे-

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अगर आपको पढ़ना अच्छा लगता है तो सुधा मूर्ति की किताबें ज़रूर पढ़ें.