असल दुनिया की प्रेम कहानियां भी फ़िल्मी ही लगती हैं, क्यंकि उनमें एक हीरो होता है, एक हीरोईन होती है और विलेन का किरदार परिस्थितियां निभाती हैं. ये कहानी एक हीरे की है इसे तो फ़िल्मी होना ही था. अनिल कपूर की अपनी मोहब्बत की दास्तां एक फे़सबुक पेज़ Humans Of Bombay ने बहुत ही प्यारे शब्दों में दुनिया के सामने रखा. जिसे पढ़ने के बाद उनके चाहने वालों का 'Awwww' निकल गया.

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आइए जानते हैं, अनिल की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी...

मेरे एक दोस्त ने सुनीता को मेरा नंबर एक प्रैंक कॉल करने के लिए दिया था. पहली बार तभी मैंने उसकी आवाज़ सुनी थी और उसकी आवाज़ से प्यार कर बैठा था! कुछ समय बाद हमारी मुलाकात एक पार्टी में हुई और मेरा परिचय उससे कराया गया... उसमें कुछ तो ऐसी बात थी, जो मुझे उसकी ओर आकर्षित कर रही थी. हमने बातें करनी शुरू की और दोस्त बन गए. तब हम एक दूसरी लड़की की बातें किया करते थे, जिसे मैं पसंद करता था. फिर अचानक से वो दूसरी लड़की कहीं चली गई और मेरा दिल टूट गया. फिर मेरे टूटे दिल की वजह से सुनीता के साथ मेरी दोस्ती और गहरी हो गई!
जितना मैं जानता था, सुनीता हमेशा मेरे साथ थी. हम डेट करने लगे. ये फ़िल्मों जैसा नहीं था, मैंने उससे अपनी गर्लफ़्रेंड बनने के लिए नहीं बोला था... हम दोनों को बस पता था. उसे इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता था कि मैं कौन था और मेरा पेशा क्या है... ये कभी मुद्दा रहा ही नहीं.

ठीक से याद नहीं, लेकिन किसी महान इंसान कहा है कि आपको अपनी पहली मुलाकात याद रहती है लेकिन अपने प्यार की शुरुआत नहीं याद रहती क्योंकि प्यार कोई घटना नहीं एहसास है.

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वो एक खुले विचारे वाले परिवार से थी. एक बैंकर की बेटी, जिसका मॉडलिंग करियर मज़े में चल रहा था और मैं पूरी तरह बेकार था! मैं चेंबुर में रहता था और वो Nepeansea Road , इसलिए मैं उसे फ़ोन पर कहता था,'मैं बस पकड़ कर एक घंटे में आता हूं'. वो चिल्लाती, 'नहीं टैक्सी से जल्दी आओ', फिर मैं कहता, 'अरे मेरे पास पैसे नहीं हैं'... इस पर वो कहती 'तुम बस आ जाओ मैं देख लूंगी' और वो मेरी कैब का भाड़ा देती!
हमने दस साल तक एक दूसरे को डेट किया. हम साथ में घूमे, साथ में बड़े हुए. शुरुआत से ही उसने साफ़-साफ़ बोल दिया था कि वो किचन में नहीं जाएगी और खाना नहीं बनाएगी. अगर मैं कहता 'खाना दो', तो मुझे लात पड़ती. तो मेरे दिमाग में ये बात साफ़ थी कि मुझे उससे शादी के लिए पूछने से पहले कुछ बनना पड़ेगा. मैं काम की तलाश के लिए संघर्ष कर रहा था... लेकिन उसकी ओर से कोई दबाव नहीं था, वो बिना शर्त मुझे सपोर्ट कर रही थी.

ये तब की बात है जब अनिल कपूर एक हस्ती नहीं थे, ये तब की बात है जब कोई अनिल कपूर को कोई जानता नहीं था. लेकिन सुनीता अनिल को जानती थी, उन्हें अनिल पर भरोसा था...

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जब मुझे मेरी पहली फ़िल्म 'मेरी जंग' मिली, तब मैंने सोचा अब घर भी आ जाएगा, किचन भी बन जाएगा और बाकि काम भी हो जाएगा... अब मैं शादी कर सकता हूं. इसलिए मैंने सुनिता को फ़ोन किया और कहा, 'चलो कल शादी कर लेते हैं- या तो कल या फिर कभी नहीं' और फिर अगले दिन हमने दस लोगों की मौजूदगी में शादी कर ली. तीन दिन के बाद मैं अपने शूट पर चला गया और मैडम हनीमून पर चली गईं... मेरे बिना!
सच कहूं तो वो मुझे बहुत अच्छे से जानती है. शायद मैं जितना ख़ुद को जानता हूं, उससे से भी ज़्यादा. हमने अपनी ज़िंदगी, अपना घर साथ बनाया है. हमने तीन बच्चों को बड़ा किया है और अच्छा और बुरा वक्त सात जीया है. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि अब जा कर हमने डेट करना शुरू किया है. रोमैंटिक वॉल्क और डिनर की शुरुआत अब हुई है.
हम 45 साल से एक-दूसरे के साथ है. हमारे पास 45 साल की दोस्ती, प्यार और साथ है. वो एक पर्फ़ेक्ट मां है, पर्फे़क्ट पत्नी है.... और शायद यही वजह है कि मैं हर सुबह उत्साह के साथ उठता हूं. और आपको पता है क्यों? जब मैं उससे पूछता हूं, 'अरे कल ही तो मैंने तुम्हें इतने सारे पैसे दिए', इस पर वो कहती,'वो सब ख़त्म हो गए'. फिर मैं बिस्तर से बाहर कूदता हूं और काम के लिए भागता हूं!

तभी कहते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ प्यार जवान होता जाता है और शायद वही जवानी अनिल कपूर के चेहरे पर झलकती है.