छत्तीसगढ़ की जेलों में पहली बार 50,000 कंबलों को पहली बार एक साथ धोया जा रहा है, जिसकी वजह है यहां मौजूद 22,000 कैदियों का कई तरह की स्किन सम्बन्धी बिमारियों से ग्रस्त होना. पिछले 5 सालों से इन कंबलों का इस्तेमाल बिना धोये ही हो रहा था, इसकी नमी को दूर करने के लिए बस इन्हें कभी-कभी धूप में रख दिया जाता था.

कंबलों को धोने का निर्णय उस समय लिया गया, जब कैदियों में त्वचा सम्बन्धी बिमारियों की शिकायतें आने लगी. जेल के डायरेक्टर जनरल गिरधारी नायक का कहना है कि 'इस बाबत वाशिंग मशीन की बात की जा रही है, जिसकी लागत करीब 40 लाख रुपये के आस-पास है.'

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जेल के एक अन्य अधिकारी का कहना है कि हाल ही में 22,000 कैदियों का मेडिकल चेकअप किया गया, जिनमें ज़्यादातरों को किसी न किसी त्वचा सम्बन्धी बिमारियों की शिकायतें थीं. जब इसकी जांच की गई, तो कंबलों के बारे में पता चला.

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इसके साथ ही ये बात भी सामने आई कि इन कंबलों को कभी धोया ही नहीं गया था. फफूंद से बचाने के लिए इन्हें बस धूप में सुख दिया जाता था. आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 5 सेंट्रल जेल, 12 डिस्ट्रिक्ट जेल और 16 सब-जेल हैं. जिनमें हर कैदी को 2-3 कम्बल दिए जाते हैं.

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इस हिसाब से कैदियों द्वारा करीब 54,000 कंबलों का इस्तेमाल किया गया. एक कंबल का इस्तेमाल 5 सालों तक किया गया. इन कंबलों के धोने की व्यवस्था राज्य की 5 सेंट्रल जेल रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, अंबिकापुर और जगदलपुर में की जाएगी.

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एक वाशिंग मशीन की क्षमता 20 किलो है, जो दिन में 500 कंबलों को साफ़ करेगी. इस काम को पूरा होने में करीब 4 महीने का वक़्त लगेगा.

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