कुछ दिनों पहले कोलकाता मेट्रो में एक घटना घटी. एक जोड़े ने एक-दूसरे को गले लगाया और सहयात्रियों ने उनकी पिटाई कर दी.

सभी तरफ़ यही सवाल उठने लगे कि आखिर गले लगाना या फिर पब्लिक में किसी के प्रति स्नेह दिखाना ग़लत क्यों है?

कोलकाता में घटी इस घटना के बाद से ही PDA (Public Display of Affection) पर होने वाली बहस ने एक बार फिर तूल पकड़ा था. ख़ासकर इसलिए भी क्योंकि ये कोलकाता(एक मेट्रो शहर) की घटना थी.

पर कहते हैं, दुनिया मोहब्बत पर ही कायम है. चाहे वो किसी के लिए भी क्यों न हो. कुछ ऐसे लोग अब भी हैं, जो साबित करते हैं कि दुनिया मोहब्बत से खाली नहीं है.

दुनिया में आज भी ऐसे शख़्स हैं जो बिना किसी चाहत के सिर्फ़ दूसरों को ख़ुश करने में यक़ीन रखते हैं. The Kolkata Breeze, फ़ेसबुक पेज पर डाली गई एक पोस्ट, कहती है मोहब्बत और नेक़दिली की कहानी.

कुछ यूं हुआ, Chirayata Chattopadhyay के साथ,

'उस दिन घर लौटने में देर हो गई थी. काफ़ी व्यस्त दिन के बाद मैंने सियालदह से बस ली. ज़ाहिर सी बात है सीट नहीं मिली. मैं सीनियर सीटिज़न्स के लिए रिज़र्वड सीट के पास खड़ा था. मानिकतला के पास, एक दादाजी बस में चढ़े. और अचानक पूरी बस का मूड बदल गया. चिड़चिड़ाहट भरे स्वर में, 'ज़रा हट के खड़े हो' से 'अरे दादाजी कैसे हैं आप' पर पहुंच गए सब. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है.

दादाजी ने सीट पर बैठते ही अपना बैग खोला और यात्रियों को मुट्ठी भर-भर कर, अलग-अलग फ़्लेवर की टॉफ़ियां बांटने लगे. हर किसी को उन्होंने टॉफ़ियां दीं, बस ड्राइवर और कंडक्टर को भी. कुछ लोग आंख फाड़-फाड़कर इस घटना को देख रहे थे, तो कुछ लोगों को ये Funny लग रहा था. लेकिन दादाजी ने बस में चढ़ते ही पूरी बस का माहौल बदल दिया. कुछ लोग तो अपने बच्चों के लिए भी दादाजी से टॉफ़ियां मांग रहे थे और दादाजी सभी को ख़ुशी-ख़ुशी टॉफ़ियां दे रहे थे.

दादाजी के बस से उतरने के बाद एक शख़्स ने हम सब को बताया कि वो एक टॉफ़ी बनाने वाली फ़ैक्ट्री में काम करते हैं. हर दिन के प्रोडक्शन का कुछ हिस्सा वर्कर्स को दिया जाता है, जो अगर चाहे तो उन्हें बेच सकते हैं. पर लगभग 75 वर्ष के दादाजी पिछले 40 वर्षों से बसों में टॉफ़ियां बांट रहे हैं.

मुझे अपनी आखों पर यक़ीन नहीं हुआ. पर मैं दोबारा उनसे ज़रूर मिलना और उनसे टॉफ़ियां लेना चाहूंगा.'

Chirayata ने दादाजी की तस्वीर तो खिंची, पर वो उतनी साफ़ नहीं आई क्योंकि वो चलती बस में थे और नहीं चाहते थे कि दादाजी को पता चले कि कोई उनकी तस्वीर खिंच रहा है.

कितनी प्यारी है ये कहानी. 40 वर्षों से एक शख़्स लगभग हर रोज़ अजनबियों में टॉफ़ियां बांट रहा है. उन्हें बेचकर दादाजी के पास पैसे कमाने का ऑपशन था, पर उन्होंने लोगों में ख़ुशियां बांटने का ऑपशन चुना. सोचकर देखिये एक अजनबी ने न जाने कितने अजनबियों के चेहरे पर मुस्कान लाई होगी.

Source- The Kolkata Breeze