पहाड़ों पर बर्फ़ गिरने और शीत लहर चलने के कारण पूरे देश में लोग ठण्ड में ठिठुर रहे हैं. जिनके सिर पर छत है वो तो फिर भी इस कड़ाके की ठण्ड से खुद को बचा ले रहे हैं, लेकिन जिनके पास छत तो दूर की बात है सर्दी से खुद को बचाने के लिए गर्म कपड़े नहीं हैं वो कैसे अपना गुज़र-बसर कर रहे हैं. शायद ही कोई इस बारे में सोच रहा हो. हर साल कितने ही लोग जो फुटपाथ पर जीने को मजबूर हैं कडाके की ठण्ड में दम तोड़ देते हैं.

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कुछ दिनों पहले ऐसी ही एक घटना घटित हुई थी झारखंड के गढ़वा जिले में, जहां एक 80 साल की बुज़ुर्ग महिला पांच दिनों तक कम्बल के लिए कलेक्ट्रेट के ऑफ़िस के चक्कर लगाती रही, लेकिन उसे कंबल नहीं मिला और ठंड लगने से एसडीओ ऑफ़िस के बाहर ही सीढ़ियों पर उसकी मौत हो गई. जी हां, ये मामला झारखण्ड के एसडीओ ऑफ़िस के सामने हुई थी, कलेक्ट्रेट कर्मचारियों का कहना था कि वो इस महिला को कम्बल देने में असमर्थ थे और कम्बल न मिलने के कारण ठण्ड के कारण इस महिला ने ऑफ़िस के बाहर ही दम तोड़ दिया.

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दैनिक भास्कर में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, बुजुर्ग महिला के भतीजे सुरेश बिंद, जो पेशे से मजदूर हैं ने बताया, 'वो मेरी चाची थीं, चाचा भी नहीं हैं और उनका बेटा बंगाल में मजदूरी करता है. चाची किसी तरह अपना गुज़ारा कर रही थीं. वो पिछले पंद्रह दिनों से घर से यही कहकर निकलती थीं कि सरकारी दफ़्तर से कंबल लेने जा रही हूं. लेकिन रोज़ाना खाली हाथ ही लौटती थी.'

वहीं जिले के एसडीओ राकेश कुमार का कहना था कि वृद्ध महिला की मौत उल्टी करने के कारण हुई थी. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि वो बुज़ुर्ग महिला किस वजह से रोज उनके ऑफ़िस आ रही थी. उन्होंने तो सोमवार से पहले इस उस महिला को कभी नहीं देखा.

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गौरतलब है कि राज्य सरकार ने एक महीने पहले लाखों कंबल पूरे राज्य में बांटने के लिए भेजे थे, जिसमें से 30,000 कम्बल गढ़वा जिले को भी दिए गए थे. लेकिन अगर गरीबों के लिए भेजे गए कम्बल उन्हीं को नहीं मिले तो किसे मिले, कहां गए सारे कम्बल?

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