बात जब खाने-पीने की हो तो जितने लोग उतनी पसंद. घर के हर मेंबर की अलग-अलग पसंद होती है. किसी को आलू-गोभी की सब्ज़ी अच्छी लगती है, तो किसी को आलू-शिमला मिर्च की. लेकिन मैं बचपन से देखता आ रहा हूं कि जब भी हम किसी फ़ैमिली ट्रिप पर जाते हैं, तो आलू-पूड़ी एकमात्र ऐसी डिश है जो सबकी पहली पसंद होती है. घूमने-फिरने के दौरान आलू-पूड़ी खाने का मज़ा ही कुछ और है. आलू-पूड़ी एक तरीके से बनाने में भी आसान होती है और लम्बे सफ़र में ख़राब होने के भी कम चांस होते हैं. यही कारण है कि चाहे ट्रिप कैसी भी हो इसके बिना हर ट्रिप अधूरी मानी जाती है.

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मुझे आज भी याद है जब मैं छोटा था और हम किसी ट्रिप जाते थे, तो मेरी दादी रात से ही तैयारी में लग जाया करती थीं. वो रात में ही ढेर सारे आलू उबालकर रख देती थी ताकि सुबह जल्दी से आलू की सब्ज़ी बना सकें. उसके बाद मम्मी और घर के बाकि लोग ढेर सारी पूड़ियां बनाने में लग जाया करते थे. दादी के हाथ की बनी आलू की सब्ज़ी मुझे आज भी उनकी याद दिलाती है. लंबे सफ़र में उस सब्ज़ी का स्वाद और भी बढ़ जाया करता था. चाहे दौर कोई भी हो आलू-पूड़ी के बिना हर फ़ैमिली ट्रिप आज भी अधूरी है.

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जब कभी भी हम पूरे परिवार के साथ कहीं घूमने-फिरने जाते हैं, तो आलू-पूड़ी और अचार पूरे ट्रिप को यादगार बना देता था. आलू-पूड़ी के बिना हम किसी ट्रिप की कल्पना भी नहीं कर सकते. सफ़र लंबा हो तो हम पूरे इंतज़ाम के साथ ढेर सारे आलू-पूड़ी तैयार करके ले जाते हैं. ताकि रास्ते में जहां कहीं भी भूख़ लगे झट से आलू-पूड़ी निकाले और खा लिए.

फ़ैमिली ट्रिप के अलावा भी हमें आलू-पूड़ी खाने के कई और मौके मिलते रहते हैं.

1- घर को कोई सदस्य जा रहा हो, तो भी आलू-पूड़ी

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मुझे आज भी याद है जब मेरे पिताजी फ़ौज में थे और छुट्टियां ख़त्म होने के बाद वो वापस जम्मू-कश्मीर में अपनी ड्यूटी के लिए जा रहे होते थे, तो मम्मी उनके लिए आलू-पूड़ी ही बनाया करती थी. वो पूरे दो दिन का खाना बनाकर रखती थीं, ताकि पापा को पूरे सफ़र के दौरान बाहर का खाना न खाना पड़े.

2- मां स्कूल के लिए भी आलू-पूड़ी ही बना देती थीं

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जब हम गांव में रहते थे, तो मेरा स्कूल घर से काफ़ी दूर था. मां सुबह ही खेतों में काम के लिए निकल जाया करती थीं. समय की कमी के चलते वो जल्दी-जल्दी में हमारे स्कूल के लिए भी आलू-पूड़ी ही बना देती थी. स्कूल दूर था और हमें पैदल चलकर जाना पड़ता था. जब थक जाते थे, तो टिफ़िन से आलू-पुड़ी निकालकर खा लिया करते थे. सच कहूं तो भूख़ में आलू-पूड़ी कुछ ज्यादा ही स्वादिष्ट लगती थी.

3- बर्थडे के दिन भी आलू-पूड़ी

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जब हम बच्चे हुआ करते थे, तो बर्थडे भी बेहद साधारण तरीक़े से मनाया करते थे. केक, टॉफ़ी बिस्किट्स न भी हो तो चलेगा. लेकिन खाने में आलू-पूड़ी ज़रूर बनाई जाती थी. केक काटने के बाद सारे बच्चे लाइन से ज़मीन पर बैठकर बड़े चाव से आलू-पूड़ी खाया करते थे.

4- कोई भी त्यौहार हो आज भी घर में आलू-पूड़ी ज़रूर बनती है

आज भी चाहे कोई भी त्यौहार हो घर में आलू-पूड़ी ज़रूर बनती है. हमारे पहाड़ों में तो हर महीने कोई न कोई त्यौहार मनाया ही जाता है. इस दौरान आलू-पूड़ी, ख़ीर और चना न बने ऐसा हो ही नहीं सकता है.

5- बचपन में किसी दोस्त को घर पर खाने के लिए बुलाना

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बचपन में जब भी हम अपने किसी दोस्त को घर पर खाने के लिए बुलाया करते थे, तो मम्मी अच्छे पकवान तो बनाती ही थी साथ में आलू-पूड़ी भी बनाया करती थी. हम भी ख़ुशी-ख़ुशी खाया करते थे. पहाड़ी मसालों से बनी आलू की सब्ज़ी बहुत टेस्टी हुआ करती थी. ऊपर से धनिया काटकर डालने से वो और भी स्वादिष्ट हो जाती थी.

पिछले 10 सालों से घर से दूर रह रहा हूं, आज भी घर वाली आलू-पूड़ी को बहुत मिस करता हूं.