अभी हाल ही में एक ख़बर आई थी कि जापान में बुज़ुर्ग छोटे-मोटे अपराध के ज़रिये अपनी स्वेच्छा से जेलों को अपना आशियाना बना रहे हैं. जापान के बुज़ुर्ग घर में मिल रहे अकेलेपन को दूर करने और परिवार द्वारा परित्यक्त कर दिये जाने की स्थिति में जेल का रास्ता चुन रहे हैं. ऐसा वो इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि जेल में उन्हें भोजन, कपड़े और चिकित्सीय सुविधाएं आदि आसानी से मिलती हैं, जो उन्हें घर पर नसीब नहीं होतीं. इसी वजह से अधिकतर बुज़ुर्ग अपराध कर खुद गिरफ़्तार होकर जेल जा रहे हैं. गौरतलब है कि जापान में सभी युवा नौकरी कर रहे हैं, जिसके कारण बुज़ुर्गों को घर पर अधिक समय अकेले गुज़ारना पड़ता है या फिर उन्हें बोझ समझ कर छोड़ दिया जाता है.

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अब भगवान नहीं रहें बुज़ुर्ग

दरअसल, ये सिर्फ़ जापानी समाज की समस्या नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की भी मुख्य समस्या है. एक समय था, जब हमारे समाज में माता-पिता को आदर्श मानकर उनका सम्मान किया जाता था. एक समय था, जब हमारे समाज में आज से सैंकड़ों साल पहले माता-पिता को देवता माना जाता था और जब परिवार में बुज़ुर्गों को एक स्तंभ और अनुभवों का अपार भंडार माना जाता था. मगर अफ़सोस कि अब आधुनिक बच्चों के लिए ईश्वर समान माता-पिता बोझ बन गये हैं. अब आधुनिक समय में शायद बुज़ुर्गों की कोई अहमियत नहीं रह गई है.

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आधुनिक समाज ने वृद्धावस्था को अभिशाप बना दिया है

इंसान की शारीरिक अवस्था कुदरत की देन है, मगर हमारे समाज में वृद्धावस्था अब अभिशाप के समान होती जा रही है. बुज़ुर्गों का जीवनयापन अत्यंत कठिन हो गया है. कितनी अजीब बात है न कि जिन बच्चों के लालन-पालन में उनका सारा जीवन व्यतीत हो गया, जिन्होंने अपने बच्चों की खुशियों के लिए हज़ारों कष्ट सहे, अब वही बच्चे उन्हें भूलकर अपने परिवार में ही व्यस्त हैं. सच कहूं, तो कुछ लाचार हैं, तो कुछ माता-पिता के कर्त्तव्य से विमुख हो चुके हैं. बेचारे बुजुर्गों का शेष जीवन कष्ट और उपेक्षा की मार झेलकर बीत रहा है. स्थिति ऐसी हो गई है कि बुज़ुर्ग घर की दहलीज़ पर टक-टकी लगाए रहते हैं कि कोई आए, तो दो-चार बातें कर लें.

टूट रही है आदर्श परिवार की अवधारणा

आदर्श परिवार और समाज की अवधारणा टूट रही है. भारत में संयुक्त परिवार की संकल्पना को आधुनिक समाज की युवा पीढ़ी ने लील लिया है. संयुक्त परिवार मतलब बुज़ुर्गों से लेकर बच्चों से भरा-पूरा परिवार. पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां एक साथ तीन पीढ़ियां मिल-जुल कर एक ही छत के नीचे रहा करती थीं, मगर अफ़सोस कि अब हमारे देश की युवा पीढ़ी अपने बुज़ुर्ग माता-पिता के साथ दो पल बिताना भी मुनासिब नहीं समझती.

बुज़ुर्गों के प्रति संवदेनशीलता का अभाव

दरअसल, हमारे आधुनिक भारतीय समाज की समस्या ये है कि लोग अब बुज़ुर्गों के पास बैठना अपने समय की बर्बादी समझते हैं. लेकिन वो एक बात भूल जाते हैं कि जीवन की कला, समाजीकरण और भी कई महत्वपूर्ण चीज़ें बुज़ुर्गों से सीखी जा सकती हैं, मगर वे उनसे वंचित रह जाते हैं. दादा-दादी, नाना-नानी की कहानियों में जीवन की सीख हुआ करती थी, मगर अब के बच्चों को वो सुनने को नहीं मिलती. इसीलिए आज के बच्चों में समाज और रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता का अभाव देखने को मिलता है.

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युवा पीढ़ी इतनी असंवेदनशील हो गई है कि उन्हें अब इन बातों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि उनके माता-पिता कैसे हैं और किस हालत में हैं. परिवार और समाज में असंवेदनशीलता की हद तो ये हो गई है कि हम अपने ही जन्मदाता और पालनहार माता-पिता को दो वक़्त की रोटी तक नहीं दे पाते हैं. जो माता-पिता हमारे लिए सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं, हम उनके ही जान के दुश्मन आख़िर कैसे हो जाते हैं?

क़ानूनी मदद भी दूर की कौड़ी

2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में इस समय कुल आबादी के करीब दस फीसदी बुज़ुर्ग हैं. बुजुर्गों और वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए देश में क़ानून है. स्वास्थ्य, आवास, चिकित्सा आदि में भी कई तरह की सुविधाएं हैं, लेकिन देश की बुज़ुर्ग आबादी का एक बड़ा तबका ऐसा है, जो सरकारी कल्याण योजनाओं और कार्यक्रमों से वंचित है. बुज़ुर्गों के लिए क़ानूनी मदद भी दूर की कौड़ी है. अब सवाल यही है कि इस समस्या का समाधान क़ानूनी तौर पर किया जा सकता है?

दरअसल, हमारे भारतीय समाज में बुजुर्गों का मुद्दा पाश्चात्य देशों से थोड़ा भिन्न है. पाश्चात्य देशों में कानूनी संरक्षण देकर, उनके लिए ओल्ड एज होम्स खोलकर, उनके लिए रोजगार मुहैया कराकर बुज़ुर्गों की तकलीफ़ों को कम किया जा रहा है. मगर भारत में परिवार की अवधारणा अलग रही है. यहां पर रिश्ते भावनाओं से चलते हैं, समझौतों से नहीं. इसलिए बुजुर्गों की समस्या के समाधान का सबसे बेहतर हथियार हमारी संवेदनशीलता और रिश्तों की समझ है.

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संयुक्त राष्ट्र संघ कर रहा बुज़ुर्गों के लिए रोज़गार की मांग

दुनिया भर में लोगों की उम्र बढ़ रही है. ऐसा अनुमान है कि यह 2050 तक 15.6 प्रतिशत हो जाएगी. इसकी वजह जन्मदर में कमी और मृत्युदर में वृद्धि है. खासकर विकासशील देशों में उम्रदराज लोगों की संख्या बढ़ रही है. आज कल लोग बुज़ुर्गों को बोझ मानते हैं. जब तक घर के बुज़ुर्ग सदस्य से फ़ायदा मिलता है, तब तक उनकी पूछ परिवार में होती है, लेकिन जैसे ही वो बेकार हो जाते हैं, परिवार वाले उन्हें घर से निकालने पर अमादा रहते हैं. शायद इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ बूढ़े लोगों के लिए रोज़गार के अवसरों की मांग कर रहा है. अब आबादी के साथ पेंशन की धारणा भी बदल रही है.

बुज़ुर्गों का घर में होना सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ़

आपको जानकर हैरानी होगी कि समाज में बुज़ुर्गों की उपेक्षा या उन्हें घरों से दूर रखने की कुपरंपरा निम्न वर्ग के लोगों में ज़्यादा नहीं है, बल्कि सबसे अधिक समस्या उच्च वर्ग और मध्य वर्ग के लोगों में देखने को मिल रही है. हमारे समाज का एक तबका ऐसा भी है, जो बुजुर्गों को अपने सोशल स्टेटस अर्थात सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ़ मानता है. उन्हें ऐसा लगता है कि घरों में बुज़ुर्गों को रखने से हाई-प्रोफ़ाइल सोसाइटी में उनकी प्रतिष्ठा को बट्टा लग जाएगा. इसीलिए या तो ऐसे परिवार बुज़ुर्गों को घर के किसी एक कोने में कैद कर देते हैं या फिर उन्हें घर से निकाल देते हैं या फिर ओल्ड एज होम.

परिवार और समाज को समझनी होगी जिम्मेदारी

हक़ीकत तो यही है कि बुज़ुर्गों के लिए सिर्फ़ सरकारी प्रयासों से कुछ नहीं होने वाला है. परिवार और समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. मां-बाप बच्चों की ज़रूरतों से लेकर करियर निर्माण और शादी-विवाह की जिम्मेदारियों का वहन करने के लिए अपनी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. बस ये सोच कर कि वही बच्चे उनके बुढ़ापे का सहारा बनेंगे. मगर अफ़सोस कि समय के साथ सारा गणित उल्टा पड़ जाता है.

रिश्तों में असंवेदनशीलता के पीछे कुछ लोग ये मानते हैं कि बच्चों को पढ़ाई-लिखाई के लिए बचपन में ही मां-बाप खुद से दूर कर देते हैं और कई सालों तक बच्चे उनसे दूर रहते हैं. जिस कारण उन बच्चों के अंदर परिवार-समाज का महत्व, रिश्तों की अहमियत और संवेदनशीलता नहीं रहती. लेकिन अब सवाल ये है कि मां-बाप तो अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए ही खुद से दूर करते हैं, तो फिर हम कौन सा उनका भविष्य बनाने के लिए उन्हें घरों से दूर कर रहे हैं? आख़िर हम उनके उपकारों को उनका कर्तव्य मानकर क्यों उन्हें अपने जीवन से दूर कर देते हैं. आख़िर क्यों उनके ही घर में उन्हें कैद कर देते हैं या फिर उन्हें बेदखल कर देते हैं.

बस एक बात याद रखियेगा, आज आप जो अपने मां-बाप के साथ कर रहे हैं, वही चीज़ आपके बच्चे भी आपके बुढ़ापे में दोहराएंगे. उस दिन अपने बुढ़ापे को मत कोसियेगा. इसलिए अभी से अपने बुज़ुर्गों का सम्मान करिये और उनके जीवन के आख़िरी पलों को सुखद बनाइये, जिससे आपके बच्चे अच्छी सीख ले सकें.

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