भारत के कई बेहतरीन खिलाड़ियों ने अपने शानदार खेल से दुनियाभर में देश का नाम रोशन किया है. ऐसे ही एक खिलाड़ी हैं बजरंग पुनिया, जिनके संघर्ष की कहानी हर इंसान के लिए प्रेरणादायक है. ग़रीबी और बदहाली के दौर से गुजरने के बावजूद एशियाड चैंपियन बजरंग ने अपने हौसले को पस्‍त नहीं होने दिया.

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एशियाड और कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाले बजरंग पुनिया 65 किग्रा फ़्री स्टाइल भार वर्ग में दुनिया के नंबर एक रेसलर बन गए हैं. बजरंग 96 अंक के साथ वर्ल्ड रैंकिंग में टॉप पर पहुंच गए हैं.

क्या आप जानते हैं इतनी बड़ी उपलब्धियां हासिल करने वाले इस रेसलर ने यहां तक पहुंचने में किन मुश्किलों का सामना किया है? तो चलिए आज इस होनहार युवा रेसलर के बारे में जानते हैं.

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हरियाणा के झज्जर ज़िले के एक छोटे से गांव के रहने वाले 24 साल के बजरंग पूनिया के संघर्ष की कहानी मुश्किलों भरी रही है. ग़रीबी व विपरीत हालातों से लड़ते हुए ख़ुद के मनोबल कैसे ऊंचा रखना है ये कोई बजरंग से सीखे. शोहरत और कामयाबी कभी भी आसानी से हासिल नहीं होती है. यकीनन इसके लिए ना सिर्फ कड़ी मेहनत बल्कि जुनून और संयम की ज़रूरत भी होती है. बजरंग के अंदर भी कुछ इसी तरह का जुनून और कभी हार न मानने वाला जोश है.

14 साल की उम्र अपने से बड़े पहलवानों को ललकारा

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हरियाणा में अकसर कुश्ती के आयोजन होते रहते हैं. 14 साल का बजरंग एक दिन आयोजकों की मेज के पास गया. उसने अपनी कमज़ोर माली हालत का ज़िक्र करते हुए गुज़ारिश की कि उसे पैसों की सख्त ज़रूरत है इसलिए उसे एक कुश्ती लड़ने दिया जाए. आयोजकों को बजरंग दमदार तो लगा लेकिन उसे बच्चा समझकर टाल दिया. जब बजरंग नहीं माना तो आयोजकों ने भी सामने खड़े पहलवानों में से किसी एक को चुनकर उससे लड़ने को कह दिया. फिर वही हुआ जो दंगल फ़िल्म में आमिर ख़ान की लड़कियों ने किया.

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बजरंग के पिता बलवान पूनिया भी अपने ज़माने में पहलवान रह चुके हैं, लेकिन ग़रीबी के कारण उनका देश के लिए खेलने का ख्‍वाब अधूरा ही रह गया. पिता ने अपने अधूरे सपने को पूरा करने के लिए बेटे को भी रेसलर बनाने की ठान ली थी, लेकिन हालात कुछ ऐसे थे कि बेटे की ज़रूरी डाइट तक के लिए घर में पैसे नहीं थे. बचपन की कुश्ती तो बजरंग ने जैसे-तैसे खेल ली, उनकी असल परीक्षा राज्य स्तर पर खेलने की साथ शुरू हुई.

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जब बजरंग ने राज्य स्तर पर खेलना शुरू किया तो पिता के पास पहलवान बेटे को घी पिलाने और अच्छी डाइट ले सके उसके लिए भी पैसे नहीं थे. इन तमाम मुश्किलों के बावजूद बजरंग ने अपने सपने को पूरा करने के लिए जी जान लगा दी. रेसलिंग के प्रति बेटे के जुनून देखकर पिता ने बस के बजाए साइकिल से चलने का फ़ैसला किया ताकि बेटे की डाइट के लिए कुछ पैसा बचा सके. इसके साथ ही बजरंग का खेल लगातार अच्छा होता गया और उन्हें दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में कुश्ती सीखने का मौका मिला.

ये उपलब्धियां की हासिल

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भारत के लिए 65 किग्रा फ़्री स्टाइल में खेलने स्टार रेसलर बजरंग पूनिया ने इसी साल कॉमनवेल्‍थ गेम्स और एशियन गेम्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के लिए गोल्‍ड मेडल जीता था. साल 2016 और 2017 में कॉमनवेल्‍थ चैंपियनशिप में लगातार गोल्‍ड मेडल अपने नाम किया, साल 2013 एशियन चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल, जबकि साल 2014 एशियन गेम्स व कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में सिल्‍वर मेडल अपने नाम कर चुके हैं.

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बजरंग ने योगेश्‍वर दत्त जैसे बड़े रेसलर से रेसलिंग के गुर सीखे हैं. वो आज भी योगेश्‍वर के अखाड़े में उन्‍हीं की देखरेख में ट्रेनिंग लेते हैं. योगेश्‍वर और बजरंग के बीच गुरु और चेले का नहीं बल्कि पिता और बेटे जैसा रिश्‍ता है. जी हां, एशियन गेम्‍स 2018 में फाइनल में पहुंचने पर योगेश्‍वर ने ट्वीट करते हुए लिखा, ' फाइनल में पहुंचने पर बहुत-बहुत शुभकामनाएं बेटे बजरंग पूनिया.

ये बात सौ फ़ीसदी सच है कि ग़रीबी के चलते हज़ारों प्रतिभावान खिलाड़ी समय से पहले ही अपने सपने की ओर बढ़ना छोड़ देते हैं, लेकिन बजरंग ने इसी ग़रीबी को अपनी ताक़त में बदला.