भारत में फ़ेक न्यूज़ का कारोबार किस हद तक अपनी जड़ें फैला चुका है, हाल ही में इसका उदाहरण परेश रावल के रूप में देखने को मिला, जहां उन्होंने एक झूठी ख़बर के आधार पर लेखिका अरुंधति रॉय के लिए विवादित ट्वीट कर दिया. उनके इस ट्वीट पर बहुत से लोग अरुंधति रॉय के समर्थन में उतरे हुए दिखाई दिए. हांलाकि अपनी ग़लती का एहसास होने पर परेश रावल ने अपने ट्वीट को डिलीट कर दिया.

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ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब किसी फ़ेक न्यूज़ ने बवाल खड़ा किया हो. इससे पहले भी इस तरह की झूठी ख़बरों ने कई बार बखेड़ा खड़ा किया है. कुछ दिनों पहले ही झारखंड में फैली झूठी ख़बर कई निर्दोष लोगों को बच्चा चोरी करने वाला बता कर सरेआम 17 लोगों की पीट-पीट कर जान ले चुकी है.

नोटबंदी के समय इस तरह की अफ़वाहें भी सामने आई कि 2000 रुपये के नोट में चिप है और ये सीधा RBI के नियंत्रण में है. कई न्यूज़ चैनलों ने बिना सच्चाई जाने इस ख़बर को अपने प्राइम टाइम में जगह दे दी.

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वहीं 2013 में हुए मुज़फ्फ़रनगर दंगों के समय भी इस तरह की अफ़वाहों ने माहौल बिगाड़ दिया था, जिसमें कहा गया था कि मुस्लिम लड़के हिन्दू बन कर हिन्दू लड़कियों को बहला-फुसला कर इस्लाम काबुल करवा रहे हैं. WhatsApp पर फैली ऐसी अफ़वाहों ने मुज़फ्फ़रनगर के हालातों को बद से बदतर बना दिया था.

बेशक इन ख़बरों से आपका कुछ लेना-देना न हो, पर देश के बड़े हिस्से का एक बड़ा वर्ग ऐसी ख़बरों से प्रभावित होता है और ऐसी झूठी ख़बरों को सच मान कर उस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है. पहले भले ही इस तरह की ख़बरों पर कोई गौर नहीं करता हो, पर आज सोशल मीडिया के ज़माने में ये ख़बरें जंगल में लगी आग की तरह फैलती हैं, जिसकी लपेट में न सिर्फ़ नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं, बल्कि इंसानियत भी स्वाहा हो रही है.

फ़ेक न्यूज़ पर हाल ही में आई BBC की स्टडी एक ऐसे ही ख़तरे की तरफ़ इशारा करती है, जिसका कहना है कि हिंदुस्तान में लोग आंख बंद करके किसी भी ख़बर पर भरोसा कर लेते हैं. हिंदुस्तानी ऑडियंस ये भी जानने की ज़हमत नहीं उठाती कि जिस ख़बर पर वो विश्वास कर रहे हैं, वो विश्वासपात्र है भी या नहीं?

18 से 54 साल की उम्र के लोगों पर की गयी इस स्टडी में एक और बात सामने आयी है कि इसमें 72 प्रतिशत लोगों को ये नहीं मालूम था कि कौन-सी ख़बर सच है और कौन-सी झूठ? जबकि इस स्टडी में सिर्फ़ 40% ऐसे लोग भी शामिल थे, जो ख़बरों के लिए किसी ब्रांड पर भरोसा करते थे.

बीबीसी ग्लोबल न्यूज़ लिमिटेड के सीईओ जिम एगान का कहना है कि 'इन परिणामों से साफ़ पता चलता है कि भारत में फ़र्ज़ी समाचारों के प्रभाव को महसूस किया जा रहा है.'

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