सड़क से ले कर गली मोहल्ले तक आपने अपने आस-पास ऐसे पोस्टरों को देखा ही होगा, जिसमें नेता और कुछ समाज-सेवक आपसे विदेशी चीज़ों का बहिस्कार करने के अपील करते हुए दिखाई देते होंगे. भले ही ये लोग अपने प्रचार-प्रसार और फायदे के लिए स्वदेशी का सहारा ले रहे हों, पर एक महिला ऐसी भी है, जो गांव में रह कर असल मायने में स्वदेशी के साथ खड़ी हुई दिखाई देती हैं.

शहर की आबो हवा से दूर बंगलुरु के कनकपुरा में 37 वर्षीय नागरतना ने 9 साल पहले कभी सोचा भी नहीं था कि वो कभी इस तरह दुनिया के सामने आयेंगी. दरअसल, 9 साल पहले से ही नागरतना जौ और बाजरे के बीजों को बेचने के लिए उन्हें घर में संभालती आई थीं.

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उन्होंने देखा इस काम से उनके ही गांव में रहने वाली कई अन्य महिलाएं भी जुड़ी हुई हैं. नागरतना ने इस काम से जुड़ी गांव की करीब 13 महिलाओं को एकत्रित किया और एक समूह बनाया. इस समूह ने GREEN Foundation और Mindtree की मदद से Janadhanya नाम का एक ऑनलाइन पोर्टल बनाया. इस पोर्टल की मदद से इन महिलाओं ने बीजों को ऑनलाइन बेचना शुरू किया. आज इस समूह से जुड़ी सभी महिलाएं करीब 80 से 90 हज़ार रुपये सालाना बचत करती हैं.

नागरतना का कहना है कि 'जब मैं अकेले इस काम कर को करती थी, तो मुझे इतना फ़ायदा नहीं होता था, पर जब हम सब मिल कर काम कर रही हैं, तो हमारा फ़ायदा भी बढ़ा है और काम भी. हमारे पति खेतों का काम संभालते जबकि हम बिज़नेस देखती हैं.'

आज Janadhanya ग्रुप से करीब 2750 लोग जुड़े हुए हैं, जबकि 40,000 महिलाएं इससे प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकी हैं. हाल ही में इस प्रोज़ेक्ट का शुभारम्भ 'कर्नाटक स्किल डेवलपमेंट कारपोरेशन' के चेयरमैन मुरलीधर हलप्पा ने किया. इस मौके पर UNDP के चेयरमैन Clement Chauvet ने कहा कि 'ये दर्शाता है कि किस तरह से खुद को टेक्नोलॉजी से जोड़ कर अपनी आमदनी बढ़ाई जा सकती है.'