अकसर पुलिस के बारे में कई ऐसे मामले सामने आते रहते हैं, जिसमें उन्हें कभी रिश्वत लेते हुए, तो कभी ज़बरन उगाही करते हुए देखा जाता है. पर भोपाल पुलिस इसके उलट बच्चों को शिक्षित कर सुनहरे भविष्य के निर्माण की नींव रख रही है.

ख़बरों के मुताबिक, भोपाल के गोविंदपुरा, हनुमानगंज और निशातपुरा पुलिस स्टेशन के बाहर 'बल संजीवनी परामर्श केंद्र' के तहत ऐसे अस्थाई स्कूल बनाए गए हैं, जिनमें आस-पास के स्लम्स में रहने वाले बच्चों को पढ़ाया जाता है. गोविंदपुरा पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी का कहना है कि 'हम बच्चों को गाड़ी में आस-पास के इलाकों से लाते हैं और हमारे अधिकारी हर दिन उन्हें दो घंटे पढ़ाते हैं.

इसकी शुरुआत 2016 में रमन सिंह सिकरवार ने की थी, जिसके पीछे बच्चों को आपराधिक गतिविधियों में जाने से रोक कर जीवन मूल्यों के पाठ को पढ़ाना था. इसके लिए उन्होंने कई पुलिस अधिकारियों को प्रोत्साहित किया.

गोविंदपुरा पुलिस स्टेशन के स्टाफ़ का कहना है कि 'इस प्रोग्राम के तहत उन्होंने ऐसे बच्चों को चुना, जिनकी पढ़ाई के सामने पैसा समस्या बन रहा था. इनमें वो बच्चे भी शामिल थे, जो बाल श्रम से मुक्त कराये गए थे या सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर थे.' वो आगे कहते हैं कि शुरुआत में उन्हें बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा क्योंकि पुलिस की जिस तरह की इमेज है, उसके कारण घरवाले बच्चों को भेजने के लिए राज़ी नहीं थे, पर वक़्त के साथ-साथ उनका भरोसा भी कायम हो गया.

ये स्कूल हर सुबह 9 बजे शुरू हो जाता है और यहां 12 बजे तक पढ़ाई होती है. इस स्कूल में 4 साल से लेकर 12 साल के बच्चे अपना नाम लिखवा सकते हैं. अकेले गोविंदपुरा स्टेशन की बात करें, तो इसमें 25 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं, जिसमें लड़कियां भी शामिल हैं. इस स्कूल में अधिकारी अपना पसंदीदा सब्जेक्ट बच्चों को पढ़ाते हैं, जिससे बच्चों को पढ़ाने में उनकी भी रूचि बनी रहती है. इस काम में महिला अधिकारीयों की अहम भूमिका रहती है क्योंकि बच्चे उनके साथ ज़्यादा सजग महसूस करते हैं. अधिकारियों की भी ये कोशिश रहती है कि बच्चों को एक दोस्ताना माहौल उपलब्ध करा सकें.

भोपाल पुलिस का ये काम वाकई काबिले तारीफ़ है, अब देखते हैं कि बाकि प्रदेशों की पुलिस इससे क्या सबक लेती है या अब भी उनका ध्यान सिर्फ़ अंडर टेबल ही रहेगा?

Source: logicalindian