यमुना तट, टीले रेतीले, घास फूस का घर डंडे पर

गोबर से लीपे आंगन में, तुलसी का बिरवा, घंटी स्वर

मां के मुह से रामायण के दोहे-चौपाई रस घोले

आओ मन की गांठें खोलें …

मिट्टी की महक लिए भारतीय अध्यात्म व संस्कृति की पोषक परंपरा की वाहक ये पंक्तियां हैं भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी की, जो स्वच्छ छवि की राजनीति के ‘अजातशत्रु’ कहे जाते हैं. उनका जीवन प्रेरक अध्यायों की पूंजी से कमतर नहीं है.

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25 दिसंबर 1924 को जब दुनियाभर के गिरिजाघरों में जीसस के आने की खुशी में घंटियां बज रही थीं, वहीं ग्वालियर के एक साधारण से परिवार में बच्चे की किलकारियां गूंज उठी थीं. वो बच्चा जो आज़ाद भारत में समरसता की राजनीति का पर्याय बनने को जन्मा था. यह बच्चा था, अटल बिहारी वाजपेयी.

धुंए और धूल में जन्मे अध्यापक पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां कृष्णा की सात संतानों में अटल जी चौथे नंबर के हैं. एक निम्न मध्यम परिवार के इस बच्चे ने अपने जन्म के साथ ही कुछ गुण विरासत में पाए तो कुछ को खुद हासिल किया. पिता की साहित्य व लेखन के प्रति रुचि ने अटलजी को भी लेखन की ओर मोड़ा. उनकी कविताओं का मुख्य विषय राष्ट्रप्रेम ही रहा है. इसके साथ ही उन्होंने प्रकृति और समाज से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी लेखनी चलाई.

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अटल जी अपने स्कूल और कॉलेज में एक प्रखर वक्ता के रूप में पहचाने जाते थे और अपने राजनीतिक जीवन में भी उनकी भाषण शैली का लोहा उनके विरोधियों ने भी माना. जब वो बोलते थे तो लाखों की भीड़ भी थम जाती और सिर्फ उन्हें सुनती थी. उनकी आवाज में जादू था, जो सभी को बांध लेता था।. वो कभी भी लिखकर नहीं बोलते थे. हमेशा अपनी भाषा और अंदाज में हर विषय पर बोलने के लिए मशहूर अटल जी को बचपन में एक बार रटकर बोलने की आदत की वजह से स्कूल में शर्मिंदा होना पड़ा था. वह मंच पर बोलते हुए अचानक ही कुछ शब्द भूल गए और नतीजतन उन्हें वापस आना पड़ा था. लेकिन बालक अटल के हृदय ने खुद को प्रेरित किया और वे मंच पर दोबारा पहुंच गए. फिर उन्होंने बोला, इतना खुलकर बोला कि क्या रटा था, उन्हें खुद भी स्मरण नहीं रहा. हर तरफ लोग उनके भीतर के ‘नैसर्गिक वक्ता’ की तारीफ़ें करते नहीं थकते थे. उसके बाद उनके बाल मन ने एक प्रण लिया, ऐसा प्रण जिसने आने वाले कई दशकों तक उन्हें स्वेच्छा से कहीं भी कभी भी बोलने को प्रतिबद्ध किया. उनके ओजस्वी भाषण को सुनकर एक बार देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, कि ‘यह बालक आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बनेगा.'

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अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर के लक्ष्मीबाई कॉलेज से पूरी करने के बाद वाजपेयी कानपुर में डीएवी कॉलेज चले गए. यहां से उन्होंने राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की. उन्होंने कानून की पढ़ाई भी शुरू की थी लेकिन पूरी नहीं कर पाए. इस बीच उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा प्रकाशित पत्रिका में बतौर संपादक नौकरी कर ली. लेखन के प्रति उनका झुकाव पारिवारिक देन थी, उनके पिता भी एक प्रसिद्ध कवि और कई भाषाओं के ज्ञाता थे. मृत्यु या हत्या, कैदी कविराय की कुण्डलियां, संसद में तीन दशक, कुछ लेख: कुछ भाषण, सेक्युलर वाद, राजनीति की रपटीली राहें, बिन्दु बिन्दु विचार, अमर आग है, उनकी कुछ प्रकाशित रचनाएं हैं. उन्होंने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया.

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जीवनभर अविवाहित रहने वाले अटल जी शुरू से ही देश को लेकर काफी संवेदनशील रहे. 1942 में महात्मा गांधी के प्रबल अनुयायी होने के नाते अटल जी और उनके बड़े भाई ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लिया और उन्हें 23 दिनों के लिए जेल भेजा गया. तब वे 18 वर्ष के भी नहीं थे.

वाणी में प्राण और प्राण में प्रण लेकर विरले ही पैदा होते हैं. अटल जी उन्हीं विरले लोगों की विरासत लेकर जन्मे. युवावस्था से ही देश और राजनीतिक शुचिता को लेकर सजग रहे अटल जी ने राजनीति की एक नई विचारधारा को जन्म दिया. आरएसएस के प्रचारक होने के साथ ही वे देश की राजनीति में दिलचस्पी लेने लगे थे. वे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सान्निध्य में एक अभूतपूर्व नेता के रूप में निखर रहे थे, जो आगे चलकर आज़ाद भारत को एक मजबूत राजनीतिक विकल्प देने वाले थे.

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अपनी नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शिता की बदौलत ही 1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य होने के साथ ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी और फिर दीन दयाल उपाध्याय के बाद जनसंघ के नेतृत्व की सारी ज़िम्मेदारी अपने युवा कंधों पर ले ली. राजनीति के शुरुआती दिनों में वह लखनऊ से लोकसभा का चुनाव हार गए लेकिन 1957 में फिर से जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, बलरामपुर और मथुरा से चुनाव लड़ाया, जिनमें से दो सीटें तो वे हार गए लेकिन बलरामपुर की जनता ने उन्हें चुन लिया और वे दूसरी लोकसभा में पहुंच गए. यह जीत आने वाले 5 दशकों तक उनके शानदार संसदीय कॅरियर की शुरुआत थी. उन्होंने करीब 50 वर्षों तक भारतीय संसद के सदस्य के तौर पर अपनी सेवाएं दीं. जवाहर लाल नेहरू के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिन्होंने लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद संभाला. यही नहीं अटल जी अब तक के एकमात्र ऐसे सांसद हैं, जिन्हें एक साथ चार अलग-अलग राज्यों से निर्वाचित किया गया था. उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश और गुजरात वे राज्य थे, जहां से उन्हें निर्वाचित किया गया था. अटल बिहारी वाजपेयी 9 बार लोकसभा के लिए चुने गए. इसके अलावा वे दो बार राज्यसभा के लिए भी चुने गए. तमाम वजहों में यह भी एक वजह है कि उन्हें भारतीय राजनीति का ‘भीष्म पितामह’ माना जाता है.

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उन्हें हिन्दी से खास लगाव रहा है. संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में भाषण देने वाले पहले नेता की उपलब्धि भी उनके नाम दर्ज है. उस समय (1977 में) मोरारजी देसाई सरकार में विदेश मंत्री रहे वाजपेयी जी ने विदेश मंत्रालय के विरोध के बावजूद संयुक्त राष्ट्र में पहली बार हिन्दी में बोलने का ऐतिहासिक फैसला लिया और उनकी भाषा और दमदार आवाज में युवा होते भारत को पूरी दुनिया ने महसूस किया. उनके भाषण की तारीफ 12 देशों के राजनयिकों ने जब उनके कक्ष में आकर की, तो हिन्दी का गौरवशाली इतिहास अपने इस बेटे पर नाज़ करने को बेताब हो उठा. उनके शब्दों में न केवल भारतीय परम्पराओं का महान इतिहास झलक रहा था, बल्कि यह भारत की विश्व को लेकर नैतिक ज़िम्मेदारियो के प्रति संकल्प की भी गवाही दे रहा था.

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1996 में पहली बार वे 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने, उनकी सरकार गिर गई लेकिन फिर 1998 में उन्होंने दूसरी बार देश की बागडोर संभाली. हालांकि जयललिता द्वारा समर्थन वापस लेने के कारण उनकी सरकार फिर से नहीं चल पाई और वे 13 महीनों तक ही सत्ता में रह सके. लेकिन 1999 में हुए आम चुनावों के बाद भारतीय राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी का पूर्णकालिक उदय हुआ, जिन्होंने देश की राजनीति को एक नई दिशा प्रदान की. वही ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे हैं, जिन्होंने 5 साल की पूर्ण अवधि के लिए सरकार गठित की.

अपने कार्यकाल में उन्होंने पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार की दिशा में भी कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए, जिनमें लाहौर बस सेवा की शुरुआत एक सराहनीय पहल रही. इसके अलावा उन्होंने भारतीय विदेश नीति, अमेरिका के साथ मधुर सम्बन्धों की पहल, आर्थिक सुधार और स्वर्णिम चतुर्भुज योजना सहित कई ऐसे कदम उठाए, जिनके दूरगामी परिणाम सामने आए. उन्होंने 1998 में पोखरण में एक के बाद एक, पांच परमाणु परीक्षण करवाकर दुनिया को देश की तरफ देखने को मजबूर कर दिया. उन्होंने ही देश को ‘जय जवान, जय किसान जय विज्ञान’ का आधुनिक नारा दिया, जिसमें आगे बढ़ते मजबूत और कृषि प्रधान भारत की चमकीली आंखों के हज़ारों सपने नजर आते हैं. उनके शानदार व्यक्तित्व और दूरदर्शी सोच के कारण नेहरू के बाद उन्हें देश का दूसरा ‘स्टेट्समैन’ कहा जाता है.

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वह भारत के सबसे सम्माननीय और प्रेरक राजनीतिज्ञों में से एक रहे, जिनके अकाट्य तर्कों और प्रभाव का विपक्षी भी लोहा मानते हैं और उनका सम्मान करते हैं. आज भी देश की राजनीति में वाजपेयी की सक्रियता की कमी अखरती है. उन्होंने विभिन्न परिषदों और संगठनों के सदस्य के तौर पर अपनी सेवाएं दीं. लोकसभा में उनके वक्तव्यों को ‘अमर बलिदान’ नाम से संग्रहित किया गया है. उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियां, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पायी. अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति में अपना महान करियर महात्मा रामचंद्र वीर की ‘अमर कीर्ति विजय पताका’ को समर्पित कर दिया. उनके अनुसार इस कविता ने उनकी ज़िन्दगी बदल दी थी.

एक नेता के तौर पर वह जनता और विरोधियों के बीच अपनी साफ छवि, लोकतांत्रिक और उदार विचारों वाले व्यक्ति के रूप में जाने गए. आज उम्र के 92वें पड़ाव पर वे भले ही अस्वस्थ हैं लेकिन उनका मार्गदर्शन आज भी भारतीय राजनीति के लिए बेशकीमती है. अटल जी की देश के प्रति निष्ठा और सेवाओं का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने उन्हें 'भारत रत्न’ सम्मान से नवाज़ा. उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से भी सम्मानित किया जा चुका है. केंद्र सरकार ने उनके नाम पर samagraataljee.org नामक वेबसाइट भी लॉन्च की है, जिसमें उनके जीवन को पूरी तरह देखा और पढ़ा जा सकता है.

‘भूख और डर से, निरक्षरता और अभाव से मुक्त भारत’ का सपना देखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महापुरुष यूं हीं नहीं जन्म लिया करते, उसके पीछे होता है देश, काल और समाज के सपनों को पूरा करने का मकसद. वे समाज की उधड़ती सीलन की तुरपाई करते हैं, ताउम्र, लोगों की आंखों में उम्मीद बनकर तैरते हैं और उनके सामने एक ऐसी मिसाल बन जाते हैं जो बोध कराती है हमारी समरसता का. स्वच्छंद, इठलाती, सरहदों से भी लम्बी समरसता का.