हालिया हालातों ने भले ही गाय को राजनीति से जोड़ दिया हो, पर एक वक़्त ऐसा भी था, जब गायों की संख्या से किसी परिवार की सम्पन्नता का अंदाज़ा लगाया जाता है. मतलब साफ़ था, जिसके घर पर जितनी गाय, उतना ही वो अमीर. आज भले ही इसकी जगह कार और बैंक बैलेंस ने ली हो, पर गाय आज भी अपनी उपयोगिता की वजह से इन सब के बावजूद अपनी जगह बनाये हुए है. पर यदि गाय के बारे में ही बात करें, तो आज इसकी इतनी नस्लें हैं कि बहुत ही कम लोग इनके बारे में अच्छे से बता सकते हैं. आज हम आपके लिए गायों की कुछ ऐसी ही नस्लों से जुड़ी जानकारियां लाये हैं, जिनके बारे में शायद कोई पशु वैज्ञानिक भी नहीं जानता.

गिर

इस नस्ल की गाय की शुरूआत गुजरात के गिर जंगलों से मानी जाती है. ये गाय दूध देने के चक्र में करीब 3182 किलो दूध देती है, जो इसे अन्य गायों की तुलना में ज़्यादा पॉपुलर बनाता है.

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Dangis

इस नस्ल की गाय मुंबई के पास के एक गांव डांग से जुड़ी है, जिसकी वजह से इसका नाम Dangis है. ये गाय काली और सफ़ेद रंग में पाई जाती है.

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राठी

राठी नस्ल की गाय राजस्थान के बीकानेर, गंगानगर और हनुमानगढ़ के अलावा पंजाब के फाज़िलका में पाई जाती है. इसके सींग दूसरी गायों की तुलना में छोटे होते हैं और शरीर पर काले-सफ़ेद धब्बे होते हैं.

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पोंवार

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत ज़िले में पोंवार नस्ल की गाय कभी आम हुआ करती थी. इसकी ख़ासियत को देखते हुए साइंटिस्ट ने इससे एक नई गाय की नस्ल विकसित की, जो आज कई लोगों के घरों में देखी जा सकती है.

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ओंगोले

इस नस्ल की गाय का वजन करीब 432 से 455 किलोग्राम के आस-पास होता है. ये गाय साल में लगभग 279 दिनों में 600 से 2518 किलो दूध देती है. इसके दूध में फैट की मात्रा 5% के आस-पास होती है, जिसकी वजह से ये गाय आज भी अपनी पहचान बनाये हुए है.

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अमृत महल

इस गाय का ताल्लुक़ मुख्यतः कर्नाटक के मैसूर शहर से है, जिसे Benne Chavadi के नाम से भी पहचाना जाता है. इस नस्ल की गाय के सांड काफ़ी मज़बूत होते हैं, जिनका इस्तेमाल खेती में करने के साथ ही बैल गाड़ी भी खींचने के लिए किया जाता है.

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निमारी

इस नस्ल की गाय मध्य प्रदेश के खंडवा, इंदौर और बरवानी डिस्ट्रिक्ट में देखी जाती है. इस गाय की ब्रीडिंग के लिए मध्य प्रदेश सरकार भी एक ब्रीडिंग फ़ार्म बना चुकी है.

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कृष्णा

इस गाय का ज़िक्र पौराणिक कहानियों में भी मिलता है. वृन्दावन के नंद महाराज के पास ऐसी 9,00,000 गायें थीं.

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किल्लारी

पश्चिमी भारत के कई हिस्सों में इस नस्ल की गाय आज भी प्रचलित है. यहां के स्थानीय लोग इस गाय का इस्तेमाल खेती के रूप में भी करते हैं, पर इसके कम दूध देने की वजह से ये गाय आज केवल कुछ हिस्सों में ही सिमट कर रह गई है.

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साहीवाल

इस नस्ल की गाय पाकिस्तान के साहीवाल से संबंधित है, जो अब पंजाब में बड़े पैमाने पर लोगों के घर में देखने को मिलती है. इस नस्ल की गाय में गर्मी बर्दाश्त करने की क्षमता होती है, जिसकी वजह से साउथ अफ्रीका और गर्म प्रदेशों के लोग भी इसमें दिलचस्पी दिखाने लगे हैं.

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सिंधी

दूध का कारोबार करने वालों के बीच ये गाय काफ़ी पॉपुलर है, जिसकी जड़ें असल में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त से जुड़ी हुई हैं. ज़्यादा दूध देने की वजह से ये गाय पाकिस्तान के साथ-साथ हिंदुस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश समेत यूरोप में भी देखी जाने लगी है.

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थरपार्कर

कम खुराक होने के बावजूद ये गाय ज़्यादा दूध देती है. इस नस्ल की गायों का रंग खाकी, भूरा और सफ़ेद होता है. ये गाय गुजरात, राजस्थान के अलावा पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में भी पाई जाती हैं. इसमें गर्मी बर्दाश्त करने की जो ताक़त होती है, वो ही इसे रेगिस्तान में रहने के अनुकूल बनाती है. ये गाय सालाना 1,800 से 3,500 लीटर दूध देती है.

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