यूं तो इस देश पर कई शासकों का आधिपत्य रहा, जिनमें अंग्रेज़ ज़्यादा प्रभावशाली रहें. उन्होंने ना सिर्फ़ इस देश पर शासन किया बल्कि यहां के संसाधनों का भी ख़ूब इस्तेमाल किया. सोचिए, 30 करोड़ की आबादी को कुछ मुठ्ठी भर के लोगों ने अपने कब्जे में ले लिया और उन पर राज किया. ये ऐसे ही नहीं हुआ, इसके पीछे कई कहानियां हैं. आज हम उन कहानियों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनके कारण अंग्रेज़ों ने हमें मूर्ख बनाया और हमारे ऊपर शासन किया.

सन 1600 ईस्वी में अंग्रेज़ों ने व्यापार के बहाने से यहां की धरती पर अपना कदम रखा. कुछ दिन रहने के बाद उन्हें अहसास हो गया कि यहां के लोग भोले-भाले हैं और इन्हें आसानी से बेवकूफ़ बना कर शासन किया जा सकता है. उन्होंने वैसा ही किया. हमारे ही लोगों की सेना बनाई और हमारे ऊपर शासन किया. जब हमें अहसास हुआ कि हमारे ऊपर जुल्म हो रहा है, तो हम लोगों ने अंग्रेज़ों का बहिष्कार किया. मगर तब-तक बहुत देर हो चुकी थी.

1857 की क्रांति हो या जलियांवाला हत्याकांड, इन घटनाओं को भला कौन भूल सकता है? ऐसा नहीं कि उस समय हम आज़ाद नहीं हो सकते थे. हम 1857 की क्रांति में अंग्रेज़ों को यहां से खदेड़ कर भगा सकते थे, लेकिन संभव नहीं हो सका. वजह हम हिन्दुस्तानियों में आपसी तालमेल की कमी थी. देश में हर जगह विद्रोह रहा था. अंग्रेज़ों का बहिष्कार हो रहा था, मगर हम कामयाब नहीं हो पा रहे थे.

अंग्रेज़ों का सबसे बड़ा हथियार 'Divide and Rule' था. मतलब बांटो और राज करो. उन्होंने बड़ी चालाकी से हमें धर्म, प्रांत, जाति और बोली के आधार पर बांट दिया. ये हमारी सबसे बड़ी भूल थी. इस कारण हमलोग इतने कमज़ोर हो गए कि मुठ्ठी भर अंग्रेज हमें लूट कर हमारे मालिक बन बैठे. 5 तथ्यों के साथ हम समझाने की कोशिश करेंगे कि ऐसा क्यों हुआ था.

सेना को धर्म के आधार पर बांटना

अंग्रेज़ों ने बड़ी चालाकी के साथ हमारी सेना को हिन्दू और मुस्लिम के आधार पर बांट दिया. ये इसलिए किया गया ताकि सैनिक एक हो कर अंग्रेज़ों का विरोध ना करने लगे.

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इतना ही नहीं, अंग्रेज़ों ने सेना को जाति और बोली के आधार पर भी बांट दिया. वो चाहते ही नहीं थे कि सेना में किसी भी प्रकार की गुटबाजी हो.

जातिवाद की उपज अंग्रेज़ों की है

आजकल सोशल मीडिया पर ब्राह्मणवाद और सामंतवाद ख़ूब फ़ैल रहा है. देश के कई ऐसे लोग हैं, जो जाति के आधार पर एक-दूसरे से घृणा करते हैं. इसका असर आप चुनावों में भी देख सकते हैं. बात 1900 ईस्वी की है, जब अंग्रेज़ों ने भारतीय समाज को अपरकास्ट और लोवर कास्ट में बांट दिया. वे लोगों को जाति के आधार पर तरजीह देने लगे.

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सन 1881 में सशक्तिकरण के नाम पर अंग्रेज़ों ने सरकारी नौकरियों में जाति के आधार पर नौकरियां देनी शुरु कर दी. इस वजह से लाभ से वंचित जाति के लोगों पर बुरा असर पड़ा. नेताओं ने उस स्थिति को और भी ख़राब कर दिया. आज़ादी के बाद भी हम लोगों ने उस व्यवस्था को जारी रखा. अब तो राजनीति की शुरुआत ही आरक्षण से होती है.

जनगणना में छुआछूत को शामिल किया

यदि अंग्रेज़ भारत को एक प्रगतिशील देश बनाना चाहते थे, तो जनगणना में जाति का आधार ही क्यों रखा? इससे दलितों को समाज से अलगाव और ज़्यादा महसूस हुआ . और उनके हक़ के लिए बाबा साहेब आंबेडकर को लड़ना पड़ा. कैसे? आरक्षण की मांग कर के. आज स्थिति ऐसी हो गई है हर जगह दलितों के विकास की बातें हो रही हैं. इस वजह से कई ऐसे लोग हैं, जिनका आर्थिक विकास नहीं हो पा रहा. अंग्रेज़ों की सोच से वाकई इस देश को झटका लगा है.

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अंग्रेज़ों की इस छल पर पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि 'भारतीय इतिहास एक दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है.'

बंगाल का विभाजन

एक समय था, जब बंगाल देश का सबसे सशक्त राज्य हुआ करता था. इस राज्य से राजनीति की शुरुआत हुई, कोलकाता और कटक (आज़ादी से पहले, जब ओडिशा बंगाल प्रोविंस का हिस्सा था) बंदरगाह होने के कारण इस राज्य में व्यापार का बहुत बड़ा स्कोप था. अंग्रेज ये सब जानते थे. वे नहीं चाहते थे कि यहां की जनता पूर्ण रूप से जागरुक हो. इसलिए उन्होंने बंगाल का विभाजन धर्म के आधार पर कर दिया.

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सन 1991 में लॉर्ड कर्ज़न के नेतृत्व में लिया गया ये फ़ैसला हिन्दुस्तानियों के लिए मनहूस साबित हुआ. बंगाल को पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल में बांट दिया गया. पूर्वी बंगाल को मुस्लिम बहुल बना दिया गया और पश्चिमी बंगाल को हिन्दू बहुल. आज़ादी के समय पूर्वी बंगाल, पूर्वी पाकिस्तान बन गया, जो आज बांग्लादेश के रूप में जाना जाता है.

हिन्दू-मुस्लिम को अलग मतदाता की तरह देखना और मुस्लिम लीग का प्रमोशन

देश को धर्म और जात-पात के नाम पर बदलने के बाद अंग्रेज़ों ने बड़ी चालाकी से चुनाव पद्धति में अलग इलेक्टोरेट्स की व्यवस्था की. हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग वोट देने लगे. इस वजह से मुस्लिम नेताओं का मन बढ़ गया. इस फैसले से मुस्लिम लीग को काफ़ी बल मिला और नतीज़े में एक पड़ोसी देश पाकिस्तान मिला.

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अंग्रेज़ हर तरह से भारत को तोड़ना चाहते थे, ताकि वे इस देश में अस्थिरता पैदा कर सकें और यहां पर राज कर सकें. उन दिनों हिन्दुस्तान में मुसलमानों की जनसंख्या 15 प्रतिशत हुआ करती थी. ऐसे में अंग्रेज़ों ने ये चाल चल कर देश का विभाजन करवा दिया. ये विभाजन ऐसा हुआ, जो अभी तक नहीं सुलझा है.

सोचिए, अंग्रेज़ों ने हमें तोड़ने के लिए कितने तरीके अपनाए. हमारी पहचान को मिटाने की कोशिश की. मगर एक हम हिन्दुस्तानी हैं, जो अभी भी उन्हें अपना आदर्श मानते हैं. वे हमें सदियों से बेवकूफ़ बनाते रहें और हम बनते रहें. ख़ुद को हमने धर्म और जाति-पात में बांध लिया.

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