ट्रांसजेंडर्स को समाज में बराबरी का स्थान दिलाने के लिए सरकार से लेकर स्वंय सेवी संस्थायें लगातार कोशिश कर रही हैं. इसी कोशिश का नतीजा है कि पहले के मुकाबले आज उनकी स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है. सुधार की इसी कड़ी में Calcutta हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए देश के सबसे बड़े बैंकिंग उपक्रम, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया को आदेश दिया है कि वो भर्ती के दौरान फ़ॉर्म में तीसरे जेंडर के लिए भी स्थान दे.

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इस बाबत 27 वर्षीय अत्रीकर द्वारा एक याचिका कोर्ट में डाली गई थी, जिसमें जस्टिस देबांगसु बसक की अध्यक्षता वाली पीठ ने SBI की भर्ती प्रक्रिया के दौरान ट्रांसजेंडर के साथ भेदभाव के साथ ही मानवाधिकारों का हनन पाया.

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आर्टिकल 15 का हवाला देते हुए कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि SBI ने अपनी भर्ती में तीसरे जेंडर के लिए कोई स्थान नहीं दिया, जो दर्शाता है कि उसने ट्रांसजेंडर्स को इस प्रक्रिया से दूर रख कर संविधान का उलंघन्न किया है.

पिछले महीने SBI ने PO के लिए ऑनलाइन आवेदन मांगे थे, जिसमें तीसरे जेंडर को स्थान नहीं देने की वजह से अत्रीकर अप्लाई नहीं कर पाए थे. कोर्ट के आदेश के बाद SBI ने अत्रीकर के फ़ॉर्म को समय सीमा ख़त्म होने के बावजूद स्वीकार कर लिया है.

नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी की पेटिशन के बाद 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर को आज़ादी दी थी कि वो केंद्र या राज्य सरकार की किसी भी योजना में ख़ुद को तीसरे जेंडर के रूप में दर्ज कर सकते हैं. अपने इस आदेश में कोर्ट ने सरकार से भी ट्रांसजेंडर के उत्थान के लिए सरकारी सेवाओं और योजनाओं में आरक्षण की बात कही थी.

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