सेंसर बोर्ड पर मोदी सरकार का एजेंडा चलाए जाने के आरोप लगते रहे हैं. पहलाज निहलानी के पद संभालने के बाद से ही फ़िल्मों से जुड़े प्रतिबंधों का दौर शुरू हो गया है और इसी के चलते वे काफ़ी विवादों में भी बने रहते हैं. सेंसर बोर्ड इस बार नोबेल अवॉर्ड विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्युमेंट्री की वजह से चर्चा में है. बोर्ड ने फिल्म में शामिल की गई अमर्त्य सेन की स्पीच के कई शब्दों पर आपत्तियां जताई हैं.

सेंसर बोर्ड ने सेन की एक स्पीच पर कैंची चलाई है जिसमें गाय, गुजरात, हिंदू, भारत और भारत का हिंदुत्ववादी दृष्टिकोण जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है. सेंसर बोर्ड ने कहा है कि इन शब्दों को फ़िल्म से हटा दिया जाए क्योंकि इन शब्दों के इस्तेमाल से देश की छवि खराब होगी.

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टेलीग्राफ़ से बात करते हुए इस डॉक्यूमेंट्री के निर्देशक सुमन घोष ने कहा, 'सेंसर बोर्ड का एटीट्यूड साबित करता है कि इस डॉक्यूमेंट्री की आज के समय में कितनी प्रासंगिकता है. सरकार की ज़रा सी आलोचना पर आपके काम को नष्ट करने की कोशिश को किसी भी लोकतंत्र के लिए सही नहीं ठहराया जा सकता. वे चाहते हैं कि सेन द्वारा गुजरात दंगों पर की गई टिप्पणी से ये शब्द हटा दिए जाएं. वे 'गाय' शब्द भी हटाना चाहते हैं और उसकी जगह बीप का इस्तेमाल करने को कह रहे हैं. '

उन्होंने कहा, 'अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त इतनी बड़ी शख्सियत द्वारा कहे गए शब्दों को हटाया जा रहा है, तो इससे यही प्रतीत होता है कि चीजें किस हद तक पहुंच चुकी हैं. इस चीज़ का सीधे-सीधे गवाह बनने के बाद मैं तो सिर्फ़ इतना ही कह सकता हूं कि मैं हैरान हूं.'

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गौरतलब है कि ये फ़िल्म अमर्त्य सेन की किताब 'एन आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन' पर ही आधारित है. 15 सालों में बनकर तैयार हुई इस फ़िल्म में अर्थशास्त्री कौशिक बसु अमर्त्य सेन से भारत की वर्तमान स्थिति पर चर्चा कर रहे हैं. इसे घोष की 2011 में आई डॉक्यूमेंट्री, Amartya Sen: A Life Reexamined का सीक्वल माना जा रहा है. जिन शब्दों पर यह आपत्तियां जताई गई हैं वह अमर्त्य सेन ने अपने एक लेक्चर में बोले हैं जो उन्होंने कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में दिया था.

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