बेशक हम खुद को काफ़ी प्रगतिशील कहते हों, पर माहवारी जैसे मुद्दों पर बात करने से कतराते हैं. शायद इसी कतराने की वजह से बच्चे मुद्दों के प्रति अपने हिसाब से अलग-अलग जानकरियां हासिल करते हैं और इनके प्रति गलत राय बना बैठते हैं.

National Menstrual Conclave के दौरान दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री ने माहवारी जैसे मुद्दों पर जागरूकता के लिए बात करने की बात कही. इसके साथ ही मनीष ने कहा कि 'हम लोगों ने स्कूल को चारदीवारी बना कर रख दिया है, जहां बच्चे सिर्फ़ पढ़ने आते हैं. लेकिन स्कूलों की भूमिका यही खत्म नहीं हो जाती, बल्कि ऐसे मुद्दों पर बात करने में ये अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं.’

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ये सिर्फ़ जानकारियों का अभाव है, जिसकी वजह से सामान शरीर होने के बावजूद एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया को लोगों ने टैबू बना दिया है. इसके बारे में हमें लड़कों से बात करनी होगी, जिससे लड़कियां कभी खुद को उनसे अलग न समझे.

सच कहूं तो मनीष जी ने वाकई एक ऐसे मुद्दे को उठाया है, जिस पर बात होनी ज़रूरी है. सालों से ये एक ऐसा मुद्दा रहा है, जिसकी वजह से लड़कियां स्कूल में खुद को अलग-थलग महसूस करती हैं.

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