हालांकि कहा जाता है कि इतिहास के साथ ज़्यादा छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए लेकिन शायद सबसे ज़्यादा छेड़छाड़ इसी विषय के साथ होती है. भारत-पाकिस्तान के विभाजन के बाद से बहुत सी बातें सामने आई, कहीं कोई महात्मा गांधी को दोष देता है, तो कहीं मोहम्मद अली जिन्ना पर आरोप लगाये जाते हैं. इसके अलावा एक अलग मत का मानना है कि जवाहरलाल नेहरु के राजशाही लालच के चलते विभाजन हुआ. ऐसे तमाम सच-झूठ इतिहास की दीवार पर बनते-बिगड़ते रहते हैं. इन सब का प्रभाव किसी ना किसी पर ज़रूर पड़ता है, खासतौर पर विद्यार्थियों पर. बहरहाल बात हो रही है भारत और पाकिस्तान की पाठ्य पुस्तकों की. ना जाने कितने बच्चे रोज़ इतिहास की कुछ ऐसी जानकारी अपनी दिमागी जेब में भर ले जाते हैं, जो किसी ना किसी ने अपने आप से बना दी. धीरे-धीरे ये बनी बनाई बातें ही इतिहास बन जाती हैं.

दोनों मुल्कों की किताबों में इतिहास का अलग-अलग वर्णन है जबकि विभाजन से पहले दोनों मुल्क एक थे, जाहिर-सी बात है तो इतिहास भी एक ही होना चाहिए था.

हम पहले भी बात चुके हैं कि जहां औसत भारतीय के दिमाग में है कि विभाजन मोहम्मद अली जिन्ना के कारण हुआ, वही अमूमन पाकिस्तानियों में यही धारणा महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरु के प्रति बन चुकी है.

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1. सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34)

यह आंदोलन महात्मा गांधी ने छेड़ा था. इस आंदोलन के तहत ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूद्ध एक लहर छिड़ी. इस आंदोलन के तहत ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाये गये क़ानूनों का बहिष्कार किया गया. ये ज़िक्र भारतीय पाठ्य पुस्तकों में मिलता है.

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वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों में इस आंदोलन का कहीं कोई ज़िक्र ही नहीं है.

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2. ब्रिटिश भारतीय शासन का विभाजन (1947)

 

 

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3. 1947 के दंगे-फ़साद

 

 

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4. भारत-पाक युद्ध (1971)

 

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5. कश्मीर का मसला (आज भी जारी)

The Wall Street Journal के अनुसार

“भारतीय पाठ्य पुस्तकों के हिसाब से 1947 में ही कुछ अतिवादियों ने कश्मीर पर हमला कर दिया था. हरि सिंह, जो कि उस समय कश्मीर के शासक थे. उन्होंने भारतीय सरकार से मदद मांगी. कुछेक दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने के बाद भारतीय सरकार ने सेना वहां उनकी मदद के लिए भेजी थी.”

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पर पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों में लिखा गया है कि, "हरि सिंह अपने शासन में कश्मीरी मुस्लमानों पर अत्याचार कर रहे थे. जो लोग पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे, उन्हें जबरदस्ती भारत के साथ जोड़कर रखा जा रहा था.”

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हमने तो आपको तमाम जानकारी दे दी. यहां इतिहास को किसी ने तोड़ा है, मरोड़ा है, इसका अंदाजा आपको स्वयं लगाना होगा. कृप्या इसे किसी धर्म के साथ जोड़कर ना देखें, बात इतिहास की हो रही थी. बस इतिहास ही रहने दें. अगर फिर भी आपका कोई मतभेद हो तो स्वागत है आपका. कमेंट बॉक्स में पधारें.