इश्क़ की दीवारों पर जो लिखा होता है, उसे पढ़ना बहुत आसान है लेकिन उस दीवार पर लिखे हुए अल्फाज़ों को बदल अपनी ज़बान में इश्क़ लिखना बहुत मुश्किल है. मोहब्बत का पैगाम सिनेमा कई सालों से फैला रहा है. ऐसा ही पैगाम बतौर निर्देशक यश चोपड़ा दर्शकों तक पहुंचाते रहे. यहां मुनासिब ये है कि उनकी फ़िल्मों के बारे में बात करने से पूर्व उनके जीवन में थोड़ा सा झांका जाये, ताकि उनके बारे में कुछ जानकारी हासिल हो सके.

यश राज चोपड़ा का जन्म 27 सिंतबर, 1932 को लाहौर, पंजाब (फिलहाल पाकिस्तान) में हुआ था. अपने भाई बी.आर चोपड़ा के साथ उन्होंने फ़िल्मों में सहायक निर्देशक के तौर पर काम करना शुरू किया. 1965 में आई फ़िल्म "वक़्त” से उनका नाम सिनेमा में हुआ. हालांकि, इससे पहले भी वो दो फ़िल्में बना चुके थे, लेकिन शोहरत इसी फ़िल्म के कारण मिली.

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यश राज फ़िल्मस

आज जिसे आप YRF के नाम से जानते हैं, वो यश राज फ़िल्मस "वक्त" फ़िल्म की शोहरत के बाद ही खोला गया था. साल 1973 में उन्होंने इस प्रॉडक्शन हाउस की स्थापना की थी. यहां से बात उनकी फ़िल्मों की शुरु होने जा रही है. बीच-बीच में हम उनके जीवन को भी झांकते रहेंगे.

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"दीवार" ने जमाने की दीवारें हिला दी थीं

"तुम्हारे पास क्या है"

"मेरे पास मां है”

इस फ़िल्म के निर्देशक यश साब ही थे. फ़िल्म में विजय के किरदार ने इतना धमाल मचाया था कि लोगों ने अपना नाम भी विजय ही रख लिया था. इस फ़िल्म की काफी सराहना हुई थी. सलीम और जावेद की जोड़ी का काम था कि फ़िल्म की स्क्रिपट भी दमदार थी.

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'सिलसिला' फ़िल्म अपने आप में सिलसिला ही थी

'सिलसिला' फ़िल्म से जोड़कर अमिताभ बच्चन और रेखा के रिश्ते को लेकर कई तरह के कयास लगाये जाते थे और आज भी लगाये जाते हैं, पर ये यश जी का ही कमाल था कि उनके रिश्ते को उन्होंने फ़िल्म पर हावी नहींं होने दिया. यश साब के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म के गाने काफ़ी शानदार थे.

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इन सबके अलावा 'जोशिला', 'विजय', 'चांदनी', 'लम्हे', 'परम्परा', 'डर', 'दिल तो पागल है' और अंत में वीर-ज़ारा जैसी फ़िल्मों का निर्देशन यश साब ने ही किया है.

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इनका फ़िल्मी करियर 50 सालों तक चला. इसमें इन्होंने 50 से ज़्यादा फ़िल्में बनाई. ये एक ऐसे निर्माता थे, जिन्हें छह बार अपनी फ़िल्मों के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके अलावा सर्वक्षेष्ठ निर्देशक के लिए चार बार इन्हें फिल्म फेयर से भी नवाज़ा गया. साल 2001 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार और 2005 में सिनेमा में योगदान के लिए पद्म भूषण भी मिला. 21 अक्तूबर 2012 को मुंबई में डेंगू से इनकी मौत हो गई. रोमांस को जीने वाला एक निर्देशक हम सबको अलविदा कहकर अपनी फ़िल्मों को यादों के पिटारे के रुप में हमें दे गया.

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