क्या आपको पता है कि भारत में हर साल एक लाख से भी ज़्यादा लोग आत्महत्या करते हैं? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आत्महत्या करने वालों में लगभग 80 % लोग पढ़े-लिखे होते हैं. इतना तो देश में साक्षरता-प्रतिशत भी नहीं है. दुनिया भर के आंकड़े देखे जाएं, तो भी भारत आत्महत्या के मामले में बहुत आगे है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन के मुताबिक, आत्महत्या करने में भारतीय महिलाओं का 6वां और पुरुषों का 22वां स्थान है. आख़िर क्या वजह है कि इतनी ख़ूबसूरत जिंदगी को लोग अपने ही हाथों खत्म कर लेते हैं? 

ये हैं वे 7 वजहें, जो भारतीयों को आत्महत्या के लिए मजबूर करती हैं.

1. नहीं सही जाती घरेलू हिंसा :

आत्महत्या करने में भारतीय महिलाओं का दुनिया में 6वां स्थान बताता है कि देश में आज भी महिलाएं कितना कुछ झेल रही हैं. पुरुषवादी सोच वाले देश में महिलाओं को आज भी अपने हक़ों के लिए लड़ना पड़ता है और आगे बढ़ने में कई रुकावटों का सामना करना पड़ता है. घरेलू हिंसा उनके जी का सबसे बड़ा जंजाल है. शारीरिक और मानसिक शोषण उन्हें अवसाद से भर देता है और वे परेशान होकर मौत को गले लगा लेती हैं.

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2. प्यार बिना सब लगता है बेकार :

प्रेम-प्रसंग में धोखा या असफ़लता भारत में होने वाली आत्महत्याओं की बड़ी वजह है. प्यार हासिल न होने पर आत्महत्या करने के मामले भारत में आम हैं. ज़ाहिर है कि इनमें युवाओं का प्रतिशत ज़्यादा होता है. विवाहित लोग भी आपसी मतभेद, ग़लतफहमी या धोखे खाने के कारण आत्महत्या कर लेते हैं. सिर्फ़ प्रेमी-प्रेमिका या पति-पत्नी से नहीं, बल्कि परिवार के दूसरे सदस्यों जैसे मां-बाप, भाई-बहन, सास-ससुर आदि से सम्बन्ध ख़राब होने के कारण भी आत्महत्या के मामले सामने आते हैं. रिश्तों में समस्या आत्महत्या की एक मुख्य वजह है.

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3. न हो पैसा, तो जीना कैसा :

भारत में कुछ लोगों का यही मानना है कि पैसे के बिना जीना मुश्किल है. क़र्ज़ में डूबे लोगों का आत्महत्या कर लेना देश में आम बात है. ऋण देने वाली संस्थाओं के दबाव और साहूकारों आदि के लगातार परेशान करने से तंग हो कर अकसर लोग मौत को गले लगा लेते हैं. घर के ख़र्चों, परिवार के सदस्यों की बीमारी के इलाज में असमर्थता और बेरोज़गारी से बच निकलने का रास्ता, लोगों को आत्महत्या ही नज़र आता है.

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4. पढ़ाई का दबाव :

भारत के मध्यम और निम्न वर्गों में अच्छी शिक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है. इन वर्गों में बच्चों की पढ़ाई के लिए मां-बाप लोन भी लेते हैं. आगे रहने की होड़ बच्चों से ज़्यादा अकसर उनके मां-बाप को होती है. बहुत से बच्चे इस दबाव को झेल नहीं पाते. ख़राब नम्बर्स आने, फ़ेल होने या मनमुताबिक नम्बर्स न आने पर वे आत्महत्या जैसा जानलेवा क़दम उठा लेते हैं. यह स्थिति हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था की विफ़लता को भी बताती है.

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5. नशा छीन लेता है ज़िन्दगी :

नशे की लत देश के हर वर्ग की समस्या है. ज़रूरत से ज़्यादा मादक पदार्थों का सेवन, इसके कारण दिमागी असन्तुलन और घरेलू कलह इंसान के अवसाद को कम करने की बजाय कई गुना बढ़ा देती है. अवसाद का बढ़ता स्तर कई बार आत्महत्या पर मजबूर करता है. निम्न वर्ग के लोग जब पैसे की कमी से अपनी लत को पूरा नहीं कर पाते, तब भी ऐसे क़दम उठा लेते हैं.

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6. दर्द से मौत भली :

लम्बे वक़्त से लाइलाज बीमारियों से जूझ रहे लोगों को लगने लगता है कि दर्द से अच्छी मौत है. साल 2014 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या के कुल मामलों में से 15,419 मामले पुरानी लम्बी बीमारियों से जुड़े थे. ठीक न होने की उम्मीद के चलते लोगों को लम्बे असहनीय दर्द की तुलना में मौत आसान नज़र आने लगती है.

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7. मानसिक बीमारियां करती हैं परेशान :

हर साल भारत में मानसिक बीमारियों से पीड़ित हज़ारों लोग आत्महत्या कर लेते हैं. 21वीं सदी में भी देश अन्धविश्वास से इस कदर ग्रस्त है कि पढ़े-लिखे लोग भी मानसिक बीमारियों को बीमारी की तरह नहीं लेते और झाड़-फूंक, पूजा-पाठ करके रोगी को सही करना चाहते हैं. इन्हीं सब में वक़्त निकल जाता है और सही इलाज न मिलने से रोगी मानसिक संतुलन खो कर अपने ही हाथों अपनी जान गंवा देता है.

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आत्महत्या किसी परेशानी का हल नहीं है. कुछ पलों की कमज़ोरी ज़िन्दगी की ख़ूबसूरती पर भारी नहीं पड़नी चाहिए. जब भी कभी कोई ऐसा-वैसा ख़्याल सिर उठाए, तो अपनों के बारे में सोच कर मन मज़बूत करना चाहिए और ज़िन्दगी की जंग में जीत कर दिखाना चाहिए.

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