सआदत हसन मंटो से एक बार किसी ने पूछा कि 'आप के लेखन में ज़्यादातर अश्लीलता और नंगापन ही क्यों दिखाई देता है?' इस पर मंटो ने कहा कि 'मैं कुछ भी बाहर या कल्पना से नहीं ले कर आता, बल्कि जो मैं इस समाज में घटित होते हुए देखता हूं उसे ही कहानी का रूप देता हूं.' उनका ये इशारा साफ़ था कि साहित्य कहीं न कहीं समाज को दर्शाता है. ऐसा ही कुछ कहना आज के फ़िल्मकारों का भी है, जो इस बात का दावा करते हैं कि फ़िल्में भी समाज का एक आईना ही हैं. जो लोग फिल्मों को गन्दा कहते हैं, वो दरअसल समाज को गन्दा कह रहे होते हैं. ये कहना कतई गलत नहीं होगा कि फ़िल्म और साहित्य दोनों का काम समाज की उस दबी-कुचली सच्चाई को सामने लाना होता है. आज हम आपके लिए कुछ ऐसी ही फ़िल्मों के नाम लेकर आये हैं, जो साहित्य के रास्ते से गुज़रते हुए समाज की हक़ीक़तों को हम तक लेकर आई हैं.

ट्रेन टू पाकिस्तान

खुशवंत सिंह द्वारा लिखित ये नॉवेल, विभाजन की त्रासदी को दर्शाती हुई कहानी है, जिस पर Pamela Rooks एक खूबसूरत फ़िल्म भी बना चुकी हैं.

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गर्म हवा

'गर्म हवा' उर्दू की बड़ी कहानीकार इस्मत चुग़ताई की एक शॉर्ट स्टोरी थी, जो छपने से पहले ही लोगों के बीच पहुंच चुकी थी. इस पर बॉलीवुड के मशहूर डायरेक्टर M. S. Sathyu फ़िल्म बना चुके हैं.

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पिंजर

पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम द्वारा लिखित उपन्यास 'पिंजर' विभाजन से पूर्व की कहानी है, जब हिन्दू-मुस्लिम के बीच धर्म की खाई पूरी तरह पैदा नहीं हुई थी, पर उसकी चिंगारी सुलग चुकी थी.

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परिणीता

मशहूर बंगला लेखक शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित 'परिणीता' एक ऐसी कहानी है, जिस पर हिंदी सहित कई भाषाओं में फ़िल्म बन चुकी है.

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शतरंज के खिलाड़ी

प्रेमचन्द के उपन्यासों की खास बात ये थी कि वो अपने लेखन से अपने पत्रों और किरदारों को जीवित कर दिया करते थे. ऐसा ही कुछ सत्यजीत रे ने इस उपन्यास पर फिल्म बना कर भी किया.

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देवदास

'परिणीता' की तरह ही 'देवदास' शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय के उन उपन्यासों में से एक था, जिसे न सिर्फ साहित्य के तौर पर बल्कि फ़िल्म के रूप में भी काफी पसन्द किया गया.

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