17 की उम्र में जब धर्मेंद्र बिधूड़ी अपना पहला क्वार्टर फ़ाइनल हारे, तो उन्हें ये नहीं पता था कि हार का ये सिलसिला लम्बे समय तक चलेगा. 1990 में उनका बॉक्सिंग करियर कई हारों की भेंट चढ़कर ख़त्म हो गया. उसी साल उनकी शादी भी हो गई. बहुत कम स्पोर्ट्सपर्सन ही शादी के बाद अपना करियर बचा पाते हैं. अगर वो Mainstream Sport ना हो, तो करियर बचाना और मुश्किल हो जाता है. कुछ ऐसा ही शायद धर्मेंद्र के साथ भी हुआ.

5 साल बाद, 1995 में दिल्ली के सरिता विहार में उन्होंने बिधूड़ी बॉक्सिंग क्लब की स्थापना की. एक ऐसा बॉक्सिंग क्लब, जिसमें 10 साल बाद उनके ख़ुद के बेटे ने अपने बॉक्सिंग के सफ़र की शरुआत की.

गौरव बिधूड़ी Hamburg में आयोजित World Boxing Championship के सेमीफ़ाइनल में पहुंच गए. ऐसा करने वाले वो देश के चौथे बॉक्सर हैं. गौरव की इस जीत ने धर्मेंद्र की सारे हार को भुला दिया.

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गौरव ने बताया,

'मुझे इस टूर्नामेंट में Wild Card ऐंट्री मिली. चेक रिपब्लिक में हुए Grand Prix ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया, वहां मैंने गोल्ड जीता था. मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी है कि मेरे पापा ने मुझ पर विश्वास किया. क्वार्टर फ़ाइनल के मैच में थोड़ा प्रेशर था, पर कोच सर से बात कर के आत्मविश्वास लौट आया. अब मैं अपने मेडल का रंग बदलना चाहता हूं.'

सेमीफ़ाइनल में गौरव का मुक़ाबला अमेरिका के Duke Ragan से होगा.

गौरव को भी क्वार्टर फ़ाइनल में हार का सामना करना पड़ा है. 2014 के एशियन गेम्स और रियो के क्वालिफ़ायर मैच में ही उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.

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10 साल की उम्र में गौरव ने पहले स्टेट-लेवल टूर्नामेंट में हिस्सा लिया था. 2006 में वे Sub-Junior National Champion बन गए. 2011 में उन्होंने National Games में कांस्य पदक हासिल किया था.

गज़ब पोस्ट टीम की तरफ़ से गौरव को सेमीफ़ाइनल मैच के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं. हम आशा करते हैं कि वो अपने पिता की इच्छा को पूरा करें.

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