ये लीजिए-

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और ये भी-

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और ये भी-

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मुंह में पानी तो आ ही गया होगा. चलिए कोई नहीं, नयन सुख ही प्राप्त कर लीजिए.

राखी की रौनक को और बढ़ा देता है घेवर. हम सभी इसे राजस्थान की देन समझते हैं. असल में ये राजस्थान की नहीं, इराक़ की देन है. भारत तक इसकी विधि किसी व्यापारी के सामान के साथ आई और आज ये हमारे बीच काफ़ी ज़्यादा मशहूर हो चुकी है.

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TOI के मुताबिक, राजस्थान की मशहूर मिठाई, घेवर जो तीज और रक्षा बंधन के त्यौहारों में मिठास घोल देती है, राजस्थान की देन नहीं है.

चौंक गए न? हमें भी हैरानी हुई थी. मशहूर मिठाईवालों और हलवाइयों से इस बात का सुबूत लेने जाओगे, तो वे ना-नुकार ही करेंगे.

जयपुर की 'लक्ष्मी मिष्टान्न भंडार' के मालिक अजय अग्रवाल का कुछ यूं कहना था,

250 साल से घेवर बनाने वाले गोदावत परिवार को आज तक कोई दस्तावेज़ नहीं मिला जो साबित करे की घेवर भारत नहीं, ईरान की देन है.
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लखनऊ में 140 साल पुरानी मिठाई की दुकान चलाने वाले, सुमन बिहारी का कहना है कि घेवर जयपुर से विदेश से ही आई है.

जयपुर से लखनऊ तक का सफ़र घेवर ने वाजिद अली शाह के समय में किया.

यूं तो घेवर सालभर खाया जाता है, लेकिन सावन के महीने में इसकी डिमांड बढ़ जाती है.

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इस दिव्य मिठाई की लगभग 10 Variety हैं, जैसे- पनीर घेवर, केसरिया घेवर, मलाई घेवर, मावा घेवर आदि.

आई कहीं से भी हो, लेकिन चांदी की परत, केवड़ा या केसर Essence वाला घेवर कुछ ही पलों में परमानंद की अनुभूति दे सकता है.

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