भारतीय टेलीविजन इतिहास में शायद ही कोई ऐसा कलाकार होगा, जिसे लोग इंसान के रूप में नहीं, बल्कि भगवान के रूप में देखना पसंद करते थे. एक समय था, जब उस शख़्स को देखते ही लोग हाथ जोड़ लिया करते थे. जितनी ख्याति रामानंद सागर के रामायण धारावाहिक को मिली, उससे कई गुना ख्याति और सम्मान रामायण के 'राम' अरुण गोविल को मिली. आज रामानंद सागर के धारावाहिक 'रामायण' के 'राम' अरुण गोविल से ऐसा कोई भी नहीं है, जो अनजान होगा. उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम के किरदार को इस कदर जीवंत किया कि घर-घर में उनकी जगह बन गई और पूजे जाने लगे. परिणाम यह हुआ कि आज करोड़ों दिलों में अरुण की राम वाली छवि रची-बसी है.

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भगवान राम के रूप में उनकी तस्वीर को लोग घरों में लगाते थे

एक समय था, जब आज से 28 साल पहले शुरू हुए महान ऐतिहासिक धारावाहिक रामायण को देखने के लिए लोग टीवी के सामने चप्पल-जूते उतारकर अगरबत्ती और फूल लेकर बैठ जाते थे. सीरियल के समय सड़कें सुनसान हो जाती थीं, बाज़ार मंद पड़ जाते थे. गली-सड़क पर एक आदमी तक नहीं दिखता था. हालांकि, रामायण के एक-एक किरदार अपने आप में काफ़ी महत्वपूर्ण थे, मगर राम बने अरुण गोविल की छाप लोगों पर इस कदर थी कि लोग उनमें ही भगवान राम को देखा करते थे. राम के रूप में उनकी तस्वीर बाज़ारों में बिकने लगी थी. लोग उसे अपने घरों में रख कर पूजा करते थे.

प्रारंभ से ही नाटकों में था लगाव

रामायण के राम यानि अरुण गोविल का जन्म 12 जनवरी 1958 को राम नगर (मेरठ) उत्तर प्रदेश में हुआ था. पढ़ाई के दौरान ही वे नाटक किया करते थे. हालांकि, अभिनय को करियर बनाने के बारे में कभी उन्होंने सोचा भी नहीं था. पढ़ाई पूरी होने के बाद बिज़नेस करने के उद्देश्य से वो अपने भाई के यहां मुंबई आ गये. मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. बिज़नेस करने आए अरुण को जल्द ही इसका आभास हुआ कि वो बिज़नेस के लिए नहीं, बल्कि एक्टिंग के लिए बने हैं. इसलिए उन्होंने अभिनय का रास्ता अख़्तियार कर लिया.

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निजी जीवन में भी राम के किरदार को भुनाने की चुनौति

वैसे तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम के किरदार को निभाना किसी भी कलाकार के लिए सहज और इतना आसान काम नहीं होता, मगर अरुण गोविल ने पूरी ईमानदारी से भगवान राम के किरदार को निभाने की कोशिश की. उनकी मेहनत रंग लाई और उनकी छवि आम दर्शकों में भगवान राम की बन गई. लेकिन राम का किरदार ही कुछ इस तरह का था और लोगों के बीच वो इतने सम्मानीय थे कि साल 1986-1988 के बीच राम का किरदार निभाने के तीन वर्षो के दौरान उनके लिए पर्दे के बाहर भी अपनी राम वाली छवि बनाए रखना भी सबसे कठिन काम हो गया था.

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अरुण गोविल का शुरुआती करियर

रामायण धारावाहिक में राम के रूप में लोगों के दिलों में छाने वाले अरुण गोविल में एक्टिंग नैसर्गिक ही थी. शायद यही वजह है कि राम का किरदार निभाने से पहले उन्होंने सीरियल 'विक्रम और बेताल' में 'विक्रमादित्य' के रूप में दर्शकों की काफ़ी वाहवाही बटोरी थी. बेताल को कंधे पर लादे विक्रमादित्य की भूमिका में भी लोगों ने उन्हें काफ़ी सराहा था. इसके अलावा उन्होंने कई फ़िल्मों में भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया था. उन्होंने फ़िल्म 'पहेली', 'दिलवाला', 'हथकड़ी' और 'सावन को आने दो' जैसी हिट फ़िल्में भी दी.

किरदार की वजह से निजी जीवन में बदलाव

अरुण सिगरेट भी पिया करते थे. मगर राम के रूप में आम लोगों में वो इस कदर स्थापित हो चुके थे कि लोग उनके जीवन के हर पहलू का अनुसरण करते थे. इस वजह से उन्होंने रामायण के दौरान सिगरेट को अपने से दूर ही रखा. वे नहीं चाहते थे कि उनकी जिस छवि को लोग सिर आंखों पर बिठा कर रखते हैं, उसमें किसी तरह का प्रभाव पड़े.

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अभिनय के बाद प्रोडक्शन में रखा कदम

राम के रूप में उनकी छवि स्थापित होने के कारण लोगों ने राम के अलावा उन्हें किसी और रूप में देखने से इंकार कर दिया. नतीजा ये हुआ कि उनका एक्टिगं का करियर समाप्त हो गया. अब उनकी एक टीवी प्रोडक्शन कंपनी है, जो दूरदर्शन के लिए कार्यक्रम बनाती है.

अरुण गोविल भारतीय जनमानस में राम की छवि के रूप में इस कदर रच-बस चुके हैं कि वो लाख कोशिश कर लें, लेकिन दशकों बाद भी उन्हें लोग अरुण गोविल के रूप में नहीं, बल्कि रामायण के राम के रूप में ही देखना पसंद करेंगे.

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