1984 के सिख दंगों में आरोपी 64 साल के ओमप्रकाश को दिल्ली पुलिस ने गिरफ़्तार किया है. ओमप्रकाश पर आरोप है कि 2 नवंबर 1984 को वह गोल मार्केट की एक शराब की दुकान में घुसा और वहां जाकर उसने तोड़फ़ोड़ और चोरी की. 1984 की एफ़आईआर के मुताबिक, ओमप्रकाश के साथ 12 और लोग मौजूद थे जिन्हें मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन की पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था लेकिन बाद में इन्हें जमानत मिल गई.

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28 मार्च 1987 को एक सिटी कोर्ट ने उन पर आरोप घोषित कर दिए. इन तीस सालों में वो लगातार अपनी लोकेशन बदलता रहा. उसने शादी रचा ली, उसके दो बच्चे आज मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते हैं और 30 साल बाद आखिरकार इस शख़्स को पुलिस पकड़ पाई है.

इस मामले में भले ही पुलिस अपराधी को पकड़ने में नाकाम रही हो लेकिन सच ये है कि हमारे देश में पुलिस के साथ ही साथ न्याय प्रक्रिया के हालात आज भी लचर अवस्था में हैं.

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज टीएस ठाकुर ने एक बार कहा था, देश में जितने पेंडिंग मामले हैं उन्हें निपटाने के लिए करीब 70 हज़ार जजों की ज़रूरत है पर देश भर में केवल 18 हज़ार जज ही मौजूद है. भारत की न्याय व्यवस्था में इंसाफ़ मिलना कितना मुश्किल है, ये जगज़ाहिर है. शायद यही कारण है कि लोग कोर्ट के पचड़ों से ज़्यादा से ज़्यादा दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं. न्याय की स्थिति कितनी भयावह है, ये इन आंकडों से समझा जा सकता है.

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निचली अदालतों में 2.8 करोड़ से भी ज्यादा मामले फंसे हुए हैं. सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही यह आंकड़ा 58.8 लाख है जिसमें से 43.7 लाख मामले आपराधिक हैं. सुप्रीम कोर्ट में कुल लंबित मामलों की संख्या 62,301 हैं. हाईकोर्ट में लंबित मामलों में से 82 प्रतिशत ऐसे हैं जिन्हें दस साल से ज़्यादा हो चुका है और उच्च न्यायालयों में करीब 45 प्रतिशत जजों के पद खाली हैं.

इंसाफ़ की तलाश में जितने भी लोग कोर्ट तक पहुंचते हैं, सालों-साल इंतज़ार ही उनकी किस्मत बन जाती है और कई सालों के इंतज़ार के बाद जब फ़ैसला सुनाया भी जाता है, तो इंसाफ़ मुश्किल से ही मिल पाता है. मसलन 55 से 60 प्रतिशत मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं, रेप के मामलों में तो ये प्रतिशत और भी ज़्यादा है. कोर्ट की सालों साल चलने वाली प्रक्रिया लोगों को मानसिक और इमोश्नल स्तर पर तोड़ कर रख देती है.

Justice Delayed is Justice Denied

साधारण लोग तो इस न्याय प्रणाली में यदा कदा पिसते ही रहते हैं, लेकिन कई ऐसे हाई प्रोफ़ाइल मामले भी हैं जहां न केवल लापरवाही बरती जाती है बल्कि इतना समय खप जाता है कि इंसाफ़ की उम्मीद में लोगों के ज़िंदगी के कई दशक बर्बाद हो जाते हैं.

उपहार सिनेमाहॉल दुर्घटना का मामला भी लापरवाही की पराकाष्ठा है. इस सिनेमाहॉल में उस दौरान सभी नियमों की अनदेखी न होती तो कई जानें बच सकती थीं. इतनी बड़ी दुर्घटना के इतने साल बाद जो सज़ा मिली, उसकी भरपाई महज कुछ लाख जुर्माना देकर हुई. मामला 1997 का है. सुनवाई अठारह साल तक खिंची और फिर जो सज़ा होनी थी, वह भी नहीं हुई. क्योंकि यहां भी रसूखदार लोगों पर आरोप लगा था.

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रुचिका गिरहोत्रा मामले में सत्ता से जुड़े लोगों ने एक बड़े पुलिस अफ़सर को बचाने के लिए बहुत कोशिशें की. पूर्व डीजीपी शंभू प्रताप सिंह राठौर पर 1990 में 14 वर्षीय रुचिका गिरहोत्रा से छेड़छाड़ का आरोप लगा था. रुचिका के परिवार का ज़बरदस्त उत्पीड़न हुआ और घटना के तीन साल बाद रुचिका ने आत्महत्या कर ली. इसके बावजूद उसके परिवार को न्याय भी नसीब नहीं हुआ. घटना के 19 साल बाद हाईकोर्ट ने राठौर को महज 18 महीने की सज़ा सुनाई थी. राठौर ने इसे चुनौती दी और 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे सशर्त ज़मानत दे दी गई. क़ानून के जटिल जांच पेंचों और लचर जांच में मामला झूलता रहा और 20 साल बाद भी रूचिका को न्याय नहीं मिला.

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जेसिका लाल और प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड के मामलों में भी निचली अदालत में आरोपियों के ख़िलाफ़ मामले साबित नहीं हो पाए थे. आरूषि हत्याकांड की तरह ही पुलिस की जांच में गड़बड़ियां पाई गई. यह अलग बात है कि इन मामलों को मीडिया में खूब जगह मिली जिसके चलते लोगों का आक्रोश भड़का था, हाईकोर्ट की सुनवाई में आरोप साबित हुए और सज़ा हुई. इस दौरान जेसिका और मट्टू के परिवार वालों को मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ा था.

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दरअसल जब भी किसी मामले में इंसाफ़ की प्रक्रिया शुरू होती है तो ऐसा अक्सर देखने में आता है कि आरोपियों को मदद पहुंचाने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है. ऐसे मामलों में पुलिस की अहम भूमिका होती है और कई बार वही मामले को इतना कमज़ोर बना देती है कि कोर्ट के लिए मुजरिमों को दोषी साबित करना मुश्किल हो जाता है. इसके अलावा कई-कई सालों तक गवाही ही पूरी नहीं हो पाती जिसका सीधा फ़ायदा अक्सर आरोपियों को ही मिलता है और अप्रत्यक्ष रूप से इसका फ़ायदा मामले में रिश्वत लेने वाले लोगों को होता है.

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हालांकि ये भी सच है कि अदालतों पर इस देश के लोगों का भरोसा किसी भी अन्य सरकारी व्यवस्था से ज़्यादा है. लेकिन अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो ये भरोसा कब तक कायम रहेगा, कहना मुश्किल है.