बच्चे, स्कूल, एग्ज़ाम, कॉम्पिटिशन, अच्छे मार्क्स, ख़राब मार्क्स, एडमिशन, पढ़ाई का प्रेशर, माता-पिता, सुसाइड... अब आप सोच रहे होंगे कि हम ये इतने सारे शब्द यहां क्यों लिख रहे हैं. है ना यही बात, तो लीजिये अब जवाब भी जान लीजिये. मैंने ये जितने भी शब्द लिखे हैं वो सभी किसी न किसी रूप में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.

क्यों... अरे क्या समझे नहीं आप. ये सब शब्द एक बच्चे के साथ उस दिन से जुड़ जाते हैं, जिस दिन वो स्कूल में अपना पहला कदम रखता है. जैसे-जैसे वो बड़ा होता है उसकी किताबें बढ़ने लगती हैं, बैग का भार भी बढ़ने लगता है, अच्छे नंबर लाने का प्रेशर भी बनने लगता है. अच्छे नंबर नहीं आये तो पेरेंट्स की डांट, उनके ताने सुनने का डर सताने लगता है. डर सताने लगता है कि अगर अच्छे नंबर नहीं आये तो टॉप के कॉलेज में एडमिशन नहीं होगा और एडमिशन नहीं हुआ तो फ़्यूचर ख़राब हो जाएगा, नौकरी नहीं मिलेगी इत्यादि-इत्यादि.

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आज मैं हर माता-पिता से इसी बारे में बात करने जा रही हूं. मैं हर पेरेंट्स से ये पूछना चाहती हूं कि क्यों आप लोग अपने बच्चे पर इतना प्रेशर डालते हैं. क्या कभी आपने ये जानने की कोशिश की कि आपका बच्चा क्या करना चाहता है, क्या बनाना चाहता है? क्यों आप उस पर अपनी इच्छाएं थोपते हैं, क्यों आप जो खुद नहीं कर पाए अपनी लाइफ़ में वो अपने बच्चे से करना चाहते हैं? क्यों आप चाहते हैं कि अगर आप डॉक्टर हैं, तो आपका बच्चा भी डॉक्टर बने? क्यों नहीं वो इंजीनियर, डांसर, कॉमेडियन, सिंगर या जो वो चाहता है वो बने?

पेरेंट्स क्या आपको पता है कि देश में हर साल कितने स्टूडेंट्स सुसाइड करते हैं? नहीं पता तो हम बता देते हैं कि दुनिया में जिस देश का नाम स्टूडेंट्स द्वारा सुसाइड करने के मामले में सबसे पहले आता है वो भारत है. अब ये भी जान लीजिये कि नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, 2011 से 2015 के बीच लगभग 40,000 स्टूडेंट्स ने आत्महत्या की, जिसमें भी अकेले 2015 में आत्महत्या करने वाले छात्रों की संख्या 8,934 है. इन बच्चों में वो बच्चे ज़्यादा हैं, जो किसी न किसी कॉम्पिटिशन की तैयारी कर रहे होते है, जैसे IIT, BHU, IIM जैसे टॉप इंस्टीट्यूशन में दाखिला लेने के लिए. ये दुर्भाग्य ही है कि हमारे देश में हर घंटे एक स्टूडेंट आत्महत्या करता है. भारत में आत्महत्या करने की दर सबसे ज़्यादा 15 से 29 साल के युवाओं की है.

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अब अगर बात करें राजस्थान के कोटा शहर की, जिसे कोचिंग का गढ़ भी कहा जाता है. इस जगह पर पूरे देश यहां तक कि विदेश से भी बच्चे आते हैं कॉम्पिटिटिव एग्ज़ाम की तैयारी करने के लिए. आपको बता दें कि हर साल करीब 1.5 लाख स्टूडेंट्स देश के टॉप शिक्षण संस्थानों में दाखिला पाने की तैयारी करने के लिए कोटा आते हैं. यहां के कोचिंग सेंटर्स में IIT-JEE, M-Tech, B-Tech, MBA आदि के लिए एंट्रेंस एग्ज़ाम की तैयारी कराई जाती और दावा किया जाता है कि सफ़लता ज़रूर मिलेगी. इसके लिए बच्चों के पेरेंट्स से काफ़ी फ़ीस भी ली जाती है. साथ ही इस सफ़लता के लिए बच्चों पर ज़रूरत से ज़्यादा प्रेशर डाला जाता है. मगर कई बार बच्चे इस दबाव को झेल नहीं पाते हैं और खुदकशी की तरफ बढ़ जाते हैं. इसके लिए बच्चों और पेरेंट्स का कमज़ोर रिश्ता भी काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है.

ये आंकड़ा बेहद चौकाने वाला है कि पिछले 4 सालों में अकेले कोटा में ही 88 स्टूडेंट्स ने एग्ज़ाम के प्रेशर के चलते मौत को गले लगा लिया. और मार्च 2016 से अब तक कोटा सुसाइड हेल्प लाइन पर 1464 कॉल्स की जा चुकी हैं.

स्टूडेंट्स पढ़ाई के प्रेशर और परिवार के दबाव के चलते आत्महत्या को आसान समझते हैं और मौत को गले लगा लेते हैं. लेकिन क्या आत्महत्या ही सबसे आसान तरीका है किसी भी तरह की मुश्किल परिस्थिति से बाहर आने का. अगर ये बच्चे एक बार अपने पेरेंट्स से अपने मन की बात शेयर करें, तो शायद उनकी समस्या का हल निकल जाए. मगर ऐसा होता नहीं है. और अगर बच्चे बात नहीं कर पा रहे हैं, तो पेरेंट्स को भी तो चाहिए कि समय-समय पर अपने बच्चों के साथ बैठें और उनसे बात करें कि कहीं उनको कोई समस्या तो नहीं, कोई बात उनको परेशान तो नहीं कर रही है.

मगर अब एग्ज़ाम के प्रेशर को कम करने और बच्चों को रिलैक्स फ़ील कराने के लिए हॉर्लिक्स ने एक पहल की है. इसके लिए उन्होंने एक कैम्पेन चलाया है जिसमें बच्चों से IIT के एंट्रेंस एग्ज़ाम के फ़ोबिया को और सुसाइड पर बात की गई है. ये हॉर्लिक्स का डिजिटल कैम्पेन है, जिसका टाइटल है 'Fearless Kota'. इस वीडियो में उन्होंने IIT एग्ज़ाम्स को क्रैक करने को लेकर स्टूडेंट्स पर पड़ने वाले ज़रूरत से ज़्यादा दबाव पर प्रकाश डाला गया है. इस शॉर्ट फ़िल्म को एडवर्टाइज़िंग एजेंसी FCB Ulka ने बनाया है.

इस शॉर्ट फ़िल्म के ज़रिये स्टूडेंट्स में तनाव के कारण होने वाली मानसिक समस्याओं को उजागर किया गया है और साथ ही बात की गई है बढ़ते परीक्षा दबाव पर जिसकी वजह से छात्रों के बीच अक्सर विफलता, तनाव, अवसाद और आत्महत्या जैसे ख्याल आने लगते हैं. Fearless Kota कैम्पेन का मुख्य उद्देश्य है बच्चों को इस बात से अवगत कराना कि किसी भी परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए स्वस्थ शरीर के साथ-साथ स्वस्थ दिमाग की भी बराबर भूमिका होती है. इसलिए, एग्ज़ाम्स के डर से बचने के लिए बच्चों के लिए सही इमोशनल न्यूट्रीशियन भी आवश्यक है. शायद इसीलिए इस शॉर्ट फ़िल्म में बताया गया है कि मां का प्यार ही इमोशनल न्यूट्रीशियन की सबसे अच्छी खुराक है जिससे बच्चे को तनाव और परीक्षा के फ़ोबिया का निडरता से सामना करने में मदद मिलती है.

Video Source: Fearless Kota