सदियों से जिस तरह से सीता जी का नाम श्री राम से, नारायण जी का नाम लक्ष्मी जी से और पार्वती जी का नाम शिव जी से जुड़ा हुआ है, ठीक उसी तरह से राधा जी का नाम श्री कृष्ण से जुड़ा है. शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि कृष्ण जी के साथ राधा जी का नाम ना लिया गया हो. कोई चाहे भी तो इन दोनों नामों को एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकता है. तभी तो लोग भगवान कृष्ण को राधे-कृष्ण भी बोलते हैं. यहां तक कि हर मंदिर में भगवान कृष्ण के साथ राधा जी की मूर्ति ज़रूर होती है. बहुत की कम ऐसे मंदिर हैं जहां श्री कृष्ण की मूर्ति हो और राधा जी की नहीं. सदियों से लोग राधा-कृष्ण के प्रेम की मिसालें देते आ रहे हैं. भले ही रद्द-कृष्ण की कभी शादी नहीं हुई, लेकिन इनकी गहरे प्यार के कारण लोग आज भी दुआएं देते हैं कि जोड़ी हो तो राधा-कृष्ण जैसी.

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लेकिन जब इनका रिश्ता इतना गहरा था तो फिर ये दोनों अलग क्यों हुआ, क्यों कृष्ण, राधा जी को छोड़कर मथुरा चले गए? और जब कृष्ण जी मथुरा गए तो उसके बाद राधा जी का क्या हुआ, उनका जीवन कैसे व्यतीत हुआ जैसे कई सवाल अक्सर मन में आते हैं. क्या आपके मन में भी ऐसे सवाल आते हैं? तो आज हम कुछ ऐसे ही अनसुलझे सवालों के जवाब लेकर आये हैं. इनका प्रमाण क्या है या इनकी सत्यता की तो हम गारंटी नहीं ले सकते लेकिन ये जवाब हम सवाल-जवाब की वेबसाइट quora से ढूंढ कर लाये हैं.

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ये तो जग-जाहिर है कि जेल में जन्म होने के बाद वासुदेव जी अपने पुत्र श्रीकृष्ण को गोकुल में नंद जी के घर छोड़ गए थे. तब से मां यशोदा ने कृष्ण जी का लालन-पालन किया. नटखट नंदलाल अपनी लीलाओं से कभी लोगों को परेशान करते, तो कभी प्रसन्न. इसलिए नटखट नंदलाल को गोकुल का हर व्यक्ति चाहे वो महिला हो या पुरुष सब बहुत प्रेम करते थे. श्रीकृष्ण ने मामा कंस के अत्याचारों से गोकुलवासियों को मुक्त भी कराया.

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श्रीकृष्ण की बांसुरी की धुन का हर कोई दीवाना था. माना जाता है कि एक बार जब वो बांसुरी बजाना शुरू करते थे, हर व्यक्ति यहां तक कि मवेशी भी बेसुध उनकी तरफ खिंचे चले आते थे. गोकुल की सभी गोपियों उनकी दीवानी थीं. कृष्ण जी को सभी गोपियां बहुत प्रिय थीं. लेकिन सभी गोपियों में उसकी सबसे प्रिय गोपी थीं राधा जी. अगर राधा-कृष्ण की दीवानी थीं, तो उनसे अधिक प्रेम कृष्ण जी राधा जी को करते थे.

राधा जी श्रीकृष्ण से उम्र में 5 साल बड़ी थीं और पास के गांव में उनका जन्म हुआ था. जब भी कृष्ण बांसुरी बजाते तो सभी गोपियां उनके आसपास एकत्रित हो जातीं, उस मधुर संगीत को सुनते हुए सभी मग्न हो जाते. राधा भी कृष्ण की मधुर बांसुरी की आवाज़ से खींची चली वृंदावन पहुंच जाती थी. तो कभी कृष्ण राधा जी से मिलने उनके गांव चले जाते और उनको परेशान करते. मगर फिर एक वक़्त ऐसा आया जब कृष्ण जी को गोकुल छोड़कर मथुरा जाना पड़ा. और दोनों एक-दूसरे से बिछड़ गए.

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श्रीकृष्ण के गोकुल छोड़कर जाने की बात से हर कोई उदास था, इंसान तो इंसान जानवर भी बेसुध हो गए थे. जाने से पहले कृष्ण राधा से मिलने पहुंचे और दोनों ही एक-दूसरे से कुछ कह ना सके. राधा-कृष्ण के इस मिलन की कहानी अद्भुत है. दोनों ना तो कुछ बोल रहे थे, ना कुछ महसूस कर रहे थे, बस चुप थे. राधा कृष्ण को ना केवल जानती थी, वरन् मन और मस्तिष्क से समझती भी थीं. कृष्ण के मन में क्या चल रहा है, वे पहले से ही भांप लेती, इसलिए शायद दोनों को उस समय कुछ भी बोलने की आवश्यक्ता नहीं पड़ी. अंत में कृष्ण, राधा को अलविदा कह वहां से निकल गए.

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जहां कृष्ण के जाने से पूरा वृन्दावन सूना हो गया था, वहीं राधा जी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, क्योंकि उनके लिए तो कृष्ण उनसे अलग हुए ही नहीं थे. उनके लिए शारीरिक रूप से मिलना-बिछड़ना मायने ही नहीं रखता था और रखता भी क्यों क्योंकि वो दोनों तो भावनात्मक रूप से आपस में जुड़े हुए थे. कृष्ण जी के बारे में सोचते हुए राधा जी के दिन बीतने लगे और एक दिन वो आया जब माता-पिता के दबाव में आकर उनको शादी के बंधन में बंधना पड़ा और अपना जीवन पति, संतान और घर-गृहस्थि में लगा पड़ा. मगर अभी भी अंतर्मन से तो वो कृष्ण की ही दीवानी थीं और मन ही मन कृष्ण से प्रेम करती रहीं. इसी तरह उनकी ज़िन्दगी के कई साल बीत गए और वो बूढ़ी हो गयीं. और एक रात वो अपने घर से निकल गयीं अपने कृष्ण से मिलने के लिए और पहुंच गयीं द्वारका. द्वारका पहुँचते ही उन्होंने कृष्ण जी से मिलने की कोशिश करने लगीं और एक दिन उनको भीड़ में खड़े भगवान कृष्ण को देखा और उधर कृष्ण जी ने भी अपनी राधा को देख लिया. दोनों की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहा. मगर दोनों बस एक-दूसरे को देखते ही रहे उनकी आपस में कोई बात नहीं हुई.

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आंखों ही आंखों में भावनात्मक रूप से दोनों ने एक-दूसरे के मन को पढ़ लिया औरबिना लफ़्ज़ों के ही बात कर ली. ऐसा माना जाता है कि द्वारका में कोई नहीं जानता था कि राधा कौन थीं. इसलिए राधा के बहुत अनुरोध करने पर श्रीकृष्ण उनको महल में सेविका के रूप में नियुक्त करा दिया. राधा जी दिन भर महल में रहती, महल से संबंधित कार्यों को देखती और जब भी मौका मिलता दूर से ही कृष्ण के दर्शन कर लेती.

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जैसे-जैसे महल में उनको समय होता गया, उनके मन में श्रीकृष्ण से दोबारा दूर हो जाने का डर घर करने लगा. जो निरंतर बढ़ता जा रहा था और उन्हें सता रहा था, उनकी यह भावनाएं उन्हें कृष्ण के पास रहने न देतीं. साथ ही बढ़ती उम्र ने भी उन्हें कृष्ण से दूर चले जाने को मजबूर कर दिया. आखिरकार एक शाम को वो बिना बताये महल से निकल गई.

उनको नहीं पता था कि वो कहां और किस ओर जा रही हैं, आगे के रास्ते में उनका सामना किस परिस्थिति से होने वाला है. पर वो चलती ही जा रहीं थी. पर श्रीकृष्ण तो भगवान हैं, वो उनके मन की व्यथा को भलीभांति जानते थे उनको पता था कि राधा किस मार्ग पर जा रही हैं. चलते-चलते एक ऐसा समय जब राधा जी को कृष्ण जी की ज़रूरत पड़ी. वो एकदम अकेली थीं और एक बार बस कृष्ण को देखना चाहती थीं. उनकी ये व्यथा देख कृष्ण उनके सामने प्रकट हो गए.

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अचानक से अपने कान्हां को सामने देखकर वो बहुत खुश हुईं. और अब उनको कुछ नहीं चाहिए था, बस वो अपने प्राण त्याग देना चाह रही थीं. तब कृष्ण ने राधा से कहा कि वो उनसे कुछ मांगे लेकिन राधा ने मना कर दिया. श्री कृष्ण ने एक बार फिर कहा कि उन्होंने कभी उनसे कुछ नहीं मांगा, तो राधा ने उनसे एक आखिरी बार उन्हें बांसुरी बजाते हुए देखने की इच्छा ज़ाहिर की.

इसके बाद कृष्ण ने बांसुरी ली और मधुर धुन बजायी, बांसुरी बजाते-बजाते राधा ने अपने शरीर का त्याग किया और कृष्ण में समा गयीं और दुनिया को अलविदा कह दिया. उनके जाने के बाद श्री कृष्ण बहुत दुखी हो गए और अपनी बांसुरी तोड़ कर कोसों दूर फेंक दी.

तो दोस्तों ये थी राधा-कृष्ण की अद्भुत प्रेम कहानी, जिसको हर प्यार करने वाला आज ही नहीं, बल्कि युगों-युगों तक याद करेगा.

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