देश में किसानों की हालत किसी से छिपी नहीं है. सरकार के प्रयास भी देश के परेशानी भरे कृषि क्षेत्रों में नाकाफ़ी साबित हुए हैं. ऐसे में देश के कई युवा ग्रामीण भारत से जुड़ कर समाज के लिए मिसाल पेश कर रहे हैं. सिद्धार्थ टाटा आईआईटी मद्रास से पास आउट हुए. मैकेंज़ी एंड कंपनी में काम करते हुए उनके लिए ग्रामीण दुनिया का एक नया संसार खुल गया था.

यूं तो टाटा शुरू से ही बिज़नेस और इकोनॉमिक पत्रिकाओं में दिलचस्पी लेते रहे, लेकिन आईआईटी में एडमिशन होने के कारण उन्होंने कभी बिज़नेस पर ज़्यादा फ़ोकस नहीं किया. आईआईटी मद्रास में पढ़ने के दौरान उनकी मुलाकात प्रोफ़ेसर अशोक झुनझुनवाला से हुई. उन्होंने एक Incubation Cell की शुरुआत की थी. इंजीनियरिंग और तकनीक के सहारे प्रोफ़ेसर अशोक, समाज की कई स्तर पर मदद कर रहे थे, जिससे टाटा को काफ़ी प्रेरणा मिली.

आईआईटी से पढ़ने के बाद सिद्धार्थ ने मैकेंज़ी में चार साल काम किया. इस दौरान उन्हें ग्रामीण और कृषि सेक्टर के प्रोजेक्ट गेट्स फाउंडेशन में भी एक साल काम करने का मौका मिला. ये उनके लिए पूरी तरह से आंखें खोल देने वाला अनुभव था. उड़ीसा, मध्य प्रदेश के मुर्गी पालन प्रोजेक्ट्स और पुणे के डेयरी प्रोजेक्ट्स से उन्हें काफ़ी सीखने को मिला. कॉर्पोरेट सेक्टर की तुलना में ग्रामीण सेक्टर में हालात बेहद चुनौतीपूर्ण थे. यही कारण था कि वे इस सेक्टर की तरफ़ से काफ़ी आकर्षित हुए.

ग्रामीण क्षेत्रों का विश्लेषण करने के बाद सिद्धार्थ को लगने लगा था कि तकनीक की मदद से गांव और किसानों की समस्याओं को सुलझाया जा सकता है. यहां तक की तकनीक से खेती-बाड़ी सेक्टर में बोने वाली अनिश्चितताओं को भी काफ़ी हद तक कम किया जा सकता था.

लेकिन सवाल वही था कि आखिर कैसे तकनीक, इंजीनियरिंग और बिज़नेस के सहारे एक बड़ी आबादी को सुकून पहुंचाया जाए?

गेट्स फ़ाउंडेशन के साथ एक साल काम करने के बाद उन्होंने प्रतिष्ठित हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल जाने का फ़ैसला किया. वे फै़सला कर चुके थे कि वे कृषि के क्षेत्र में ही बिज़नेस शुरू करेंगे.

सिद्धार्थ भारत का ग्रामीण कल्चर देख-परख चुके थे, लेकिन विश्व के ग्रामीण और कृषि कल्चर को समझने के लिए उन्होंने हार्वर्ड जाने का फ़ैसला किया. हार्वर्ड में उन्हें चीन की डेयरी इंड्रस्टी से लेकर ब्राज़ील की धान की खेती तक, कई देशों के कृषि कल्चर के बारे में जानने का मौका मिला. 2016 में उन्होंने एक आईटी प्रोफ़ेशनल और ऑर्गेनिक किसान के साथ मिल कर पर्पल चिली की शुरुआत की.

पर्पल चिली का मकसद है कि अगर कोई खेती बेहद रिस्की है तो उस रिस्क को अलग-अलग फ़सलों के द्वारा कम करने की कोशिश की जाए. सब्जियों की खेती करने वाले किसानों के लिए चीज़े बेहद अप्रत्याशित होती है और अक्सर फ़सल खराब या माल की डिमांड की खत्म होने पर इसे काफ़ी रिस्की खेती माना जाता है.

जब एक किसान प्याज़ उगाता है तो उसे 90 से 95 दिनों तक इंतज़ार करना होता है और फ़िर जाकर वो बाज़ार में जाकर उसे बेचते हैं. इसकी जगह किसान 20 से 25 तरह की सब्ज़ियों को बेहतर तरीके से उगा कर लगभग हर दिन कटाई कर उसे मार्केट में बेच सकते हैं.

इस तरह की खेती करने से साल के हर महीने इन किसानों को आय उपलब्ध हो सकती है. उन्होंने किसानों को 1 एकड़ पर 2 से 4 लाख रुपये की केपिटल इंवेस्टमेंट के बारे में बताया. तीन महीने बाद फ़सलों की कटाई होने पर वे हर महीने एकमुश्त रकम ले सकते थे.

शुरुआत में किसानों को इस स्कीम के लिए मनाना थोड़ा मुश्किल था, लेकिन वो किसी तरह बेंगलुरु के एक किसान, सदाशिव को मनाने मे कामयाब रहे. पर्पल चिली ने उनके खेत को विकसित करना शुरु किया. पड़ोस के कई किसानों ने भी सदाशिव से पूछताछ करनी शुरू की और लोगों को इस अनोखे प्रोजेक्ट के बारे में पता चला.

इस तरह की खेती में लगातार निगरानी की ज़रूरत होती है. कंपनी का स्टाफ़ किसानों को दिक्कतें होने पर मदद करता है. चूंकि इस तरह की खेती में फ़सल रोज़ कट रही है, ऐसे में ये ज़रूरी है कि खेतों में रोज़ बीज लगाए जाएं. किसानों को कंपनी रोज़ बीज उपलब्ध करवाती है.

इसके अलावा पर्पल चिली किसानों को मिट्टी, पानी और बीजों से जुड़े मसले में भी मदद करती हैं. कंपनी का मकसद है कि किसान पूरी तरह से खेती पर फ़ोकस करे और मार्केटिंग का दारोमदार कंपनी पर छोड़ दे. 1 एकड़ पर किसान हर महीने आराम से ग्रामीण इलाकों में 15000 से 20000 रुपये कमा सकता है. इस कंपनी का रेवेन्यू मॉडल ऐसा है कि वे केवल सब्ज़ियों के द्वारा ही अपना मुनाफ़े का बंदोबस्त करते हैं और कंपनी किसान से कोई पैसा नहीं लेती है.

Source: Reddit