नासिक के पास लितानिया नाम का एक छोटा-सा गांव है. देश के अधिकतर गांवों की तरह, यहां के ज़्यादातर लोग भी किसान हैं. गांव एक ऐसे ही किसान परिवार में पैदा हुए प्रताप दिघवकार, जो बतौर एक IPS अधिकारी तैनात हैं. कहने को तो ये कहानी बड़ी आम-सी लगती है, पर इस कहानी में संघर्ष और सपनों की एक लंबी लड़ाई है, जिसे हाल ही में 'Humans of Bombay' नाम के एक पेज पर जगह दी गई.

पेज पर शेयर की गई इस कहानी के अनुसार, प्रताप लितानिया में पैदा हुए, जहां स्कूल के नाम पर बस एक प्राइमरी विद्यालय था. पर प्रताप की राहें तो एक अलग मोड़ ले चुकी थी. जिसके बारे में प्रताप कुछ यूं कहते हैं कि एक बार उन्होंने हवाई जहाज़ को आसमान में उड़ते हुए देखा, जिसे देख कर उन्होंने अपनी मां से पूछा की ये जहाज़ किसका है? बच्चे की बात के बहस से बचने के लिए मां ने कहा कि ये जहाज़ सरकार के होते हैं.

उस दिन से ही प्रताप ने सोच लिया कि प्रताप को कैसे भी बस किसी सरकारी नौकरी में जाना है, जिसकी शुरुआत उनके मैट्रिक के एग्जाम से शुरू हो गई थी. उन्होंने इसमें 86% अंकों के साथ पहला स्थान हासिल किया. इतने नंबरों के बावजूद जब प्रताप का दाखिला 23 किलोमीटर स्थित कॉलेज में नहीं हो पाया, तो पिता ने कहा पढ़ाई-लिखाई छोड़ो और खेती पर ध्यान दो.

पिता का कहना मानने के बावजूद प्रताप ने अपने सपनों की राह नहीं छोड़ी और मां से 350 रुपये ले कर डिस्टेंस से पढ़ाई करनी शुरू की. दिन के समय खेतों में काम करके प्रताप रात को पढ़ाई के लिए वक़्त निकालते. इसी तरह से उन्होंने ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की, जिस पर उनके करीब 1250 रुपये खर्च हुए थे. 1987 में पुलिस सर्विस एग्जाम और कंबाइंड डिफेन्स एग्जाम दिया, जिसमें उन्हें सफ़लता मिली और 22 साल की उम्र में असिस्टेंट कमिश्नर का पद संभाला.

पद संभालने के बाद भी पढ़ाई में उनकी दिलचस्पी कम नहीं हुई और देश भर में ट्रांसफर के धक्के खाते हुए आख़िरकार वो वक़्त भी आया, जब उन्हें 1993 बम ब्लास्ट का केस सौंपा गया. दिन में 18 घंटे काम करते हुए प्रताप ने आरोपी फ़ाकी अली को गिरफ्तार किया. इस बीच प्रताप ने डिस्टेंस के सहारे साइकोलॉजी में भी डिग्री हासिल की.

साइकोलॉजी में पढ़े अपने अनुभवों को प्रताप ने इंसानी दिमाग से जोड़ा और फाकी अली के परिवार को पुलिस स्टेशन बुला कर उन्हें अपमानित करना शुरू किया. अपने परिवार का अपमान फाकी ज़्यादा दिन तक नहीं देख सका और उसने उन सभी जगहों के बारे में बताया, जहां से पुलिस को AK47 राइफल्स के साथ ही गोला-बारूद का एक बड़ा जखीरा मिला. साल 2000 में उन्होंने IPS का पदभार संभाला, जिसके बाद प्रताप ने अपने गांव में एक स्कूल बनवाया और गांव के विकास कार्य के साथ भी जुड़े. उनके कामों को देखते हुए उन्हें वनश्री अवॉर्ड और इंदिरा प्रियदर्शिनी जैसे सम्मानों से भी नवाज़ा जा चुका है.

सोहनलाल शायद ऐसे लोगों को पहले ही देख चुके थे, जिसके लिए उन्होंने कहा था कि 'लहरों से डर कर नौका पर नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.'

Source: HumansOfBombay