देवानंद और वहीदा रहमान द्वारा अभिनीत 'गाइड' को रिलीज़ हुए आज पूरे 54 साल हो गए. पर आज भी इसको देखकर आपको कहीं से भी पुरानापन नज़र नहीं आएगा. लेकिन मेरा दावा है कि अगर आप इस मूवी को देखेंगे तो आपको देसीपन ज़रूर महसूस होगा.

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और हो भी क्यों न आखिर 'गाइड' भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर सरीखी फ़िल्म थी. पुरानी फ़िल्मों में पटकथा, संवाद, गीत-संगीत, बेहतरीन फ़िल्मांकन का जो ताल-मेल बिठाया जाता था, वो आज की फ़िल्मों में उतना देखने को नहीं मिलता है. तो आज फ़िल्म रिलीज़ की 52वीं वर्षगांठ पर सोचा क्यों न मैं भी इसके बारे में कुछ लिखूं, क्योंकि ये मेरी पर्सनल फ़ेवरेट फ़िल्म है. मगर मैं ये नहीं कहूंगी कि मैं नई फ़िल्में पसंद नहीं है, हां बस कम देखती हूं.

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अगर इंडियन फ़िल्म जगत को अच्छे से जानना है, तो पुरानी क्लासिक फ़िल्मों को ज़रूर देखें वैसे भी आज का युवा वर्ग कुछ ही पुरानी फ़िल्मों के बारे में जानता होगा. क्या कभी सोचा है जिस तरह से आजकल पुराने गानों को नए लिबास में युवा पीढ़ी के सामने पेश किया जा रहा है, वैसे इन पुरानी फिल्मों को भी किया जा सकता? तो मेरा जवाब है नहीं क्योंकि आज के कलाकारों में न ही वो अभिनय देखने को मिलता है और न ही वो सादगी. 'गाइड' एक ऐसी आइकॉनिक फ़िल्म है. जिसके गाने हों या डाइलॉग्ज़, डांस या फिर कहानी हर एक चीज़ क्लासिक है. ये फ़िल्म भारत के प्रसिद्ध अंग्रेज़ी लेखक आर.के. नारायण के 'द गाइड' नामक उपन्यास पर आधारित है.

1965 में रिलीज़ हुई 'गाइड' की कहानी राजू टूरिस्ट गाइड (देवआंनद) और रोज़ी (वहीदा रहमान) की प्रेम कहानी है. वैसे तो मैंने बहुत सी लव स्‍टोरीज़ देखी हैं लेकि‍न 'गाइड' उन सबसे अलग है. आज भी इस फ़िल्म को देखने के बाद आप राजू गाइड से प्यार किये बिना नहीं रह पाएंगे, वहीं वहीदा रहमान अपने किरादर को जीवंत करने में पूरी तरह से सफल हुई थीं. ये उनकी एक यादगार फ़िल्मों में से एक थी.

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तो चलिए संक्षिप्त में इसकी कहानी से रू-ब-रु करवा देते हैं. फ़िल्म की शुरुआत फ़्लैशबैक से होती है. जेल में डेढ़ साल की सज़ा काटकर राजू गाइड बाहर आता है और अपने अतीत में खो जाता है. उस अतीत में एक अधेड़ उम्र का वो पति है जिसके लिए उसकी पत्नी उसके लिए एक कीमती सामान से ज़्यादा कुछ नहीं. वहीं दूसरी ओर है वो पत्नी जो आज़ाद पंक्षी की तरह खुले आसमान में उड़ना चाहती है. लेकिन उसके पास कैद में रहने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. पर एक दिन उसकी ज़िन्दगी करवट बदलती है और वो आज़ाद होने के साथ-साथ किसी की प्रेमिका भी बनती है. उसकी ज़िन्दगी में प्यार की बहार बनकर आता है वही राजू गाइड. राजू का साथ पाकर वो कामयाबी के आसमान को छूती है. अब अगर उसके प्रेमी (राजू गाइड) की बात करें तो उसके लिए प्यार ही सबकुछ है. प्‍यार के लि‍ए उसका संघर्ष, उसकी तड़प और मजबूरी दि‍ल को दुखाती हैं. वो अपने प्यार के लिए सबकुछ करता है लेकिन आखिर में उसके पास न तो प्यार बचता है और न ही खुद का वजूद... और अंत में होता है राजू का आत्‍म-साक्षात्‍कार.

सरल शब्दों में कहा जाए तो गाइड एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें आपको प्यार मिलेगा, तो धोखा भी, रोमांच के साथ संघर्ष भी, अपनापन मिलेगा तो त्याग और कुर्बानी भी. लेकिन ये मेरी अपनी सोच है, हो सकता है आपको इसमें कुछ और नज़र आये क्योंकि हर व्यक्ति का नज़रिया दूसरे से अलग होता है.

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मगर एक बात तो तय है कि उस दौर में इस तरह की प्रोग्रेसिव फ़िल्म बनाना इतना आसान भी नहीं होगा जिसमें एक औरत अपनी आज़ादी के लिए अपने पति को छोड़ती है, समाज की परवाह न करते हुए अपने प्रेमी के साथ उसके घर में रहती है. दोनों का प्यार परवान चढ़ता है. लेकिन फिर एक समय आता है जब उनकी सभी इच्छाएं ख़त्म हो जाती हैं, प्यार कहीं खो जाता है... और खुद को खुद में पाने का इंतज़ार होता है बस.

...अगर आपने अब तक भारतीय फ़िल्म जगत के इस मास्‍टरपीस को नहीं देखा है तो ज़रूर देखि‍ए, क्योंकि इसमें प्रेम और दीवानापन तो है ही, साथ ही इसमें हैं समाज की परंपराओं की बेड़ियां भी. फ़िल्म हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्‍ठ है. आख़िर में बस इतना ही कि असीम भावनाओं के सागर का नाम है ‘गाइड'.