भारत, सदियों से आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरती के तौर पर जाना जाता रहा है. विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति को समृद्ध बनाए रखने में भारत के धर्मस्थलों की भी अहम भूमिका रही है. आपने भी इन धर्मस्थलों या मंदिरों में पारंपरिक चढ़ावे चढ़ाए ही होंगे लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के कई मंदिरों में चढ़ावे के तौर पर कई दिलचस्प चीज़ों का इस्तेमाल किया जाता है?

अलागर मंदिर, मदुरई

भगवान विष्णु के इस मंदिर का असली नाम कालास्हागर था. इस मंदिर में लोग भगवान विष्णु पर कई प्रकार के डोसा और अनाज चढ़ाते हैं. अनाज से बनने वाले डोसे का सबसे पहले भोग भगवान विष्णु को लगाया जाता है और बाकी डोसा, भक्तों में प्रसाद के तौर पर बांट दिया जाता है.

कामाख्या देवी मंदिर, असम 

गुवाहाटी में मौजूद कामाख्या मंदिर की कहानी बेहद दिलचस्प है. जून में होने वाले अंबुबाची त्योहार के पहले तीन दिन इस मंदिर को बंद रखा जाता है. चौथे दिन इस मंदिर का द्वार भक्तों के लिए खुलता है. देवी के Menstrual Fluid की मौजूदगी वाले छोटे कपड़ों को श्रद्धालुओं को प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है. इस त्योहार के दौरान कामाख्या देवी के दर्शन के लिए हज़ारों भक्त पहुंचते हैं.

चाइनीज़ काली मंदिर, कोलकाता

कोलकाता में मौजूद इस मंदिर को यूं ही चाइनीज़ काली मंदिर नहीं कहा जाता. दरअसल चाइनाटाउन के लोग इस मंदिर में काली मां की पूजा करने आते थे तब से इस मंदिर का नाम चाइनीज़ काली मंदिर पड़ गया. पारंपरिक मीठे की जगह यहां काली मां को नूडल्स, चाऊमिन जैसी चीजों का चढ़ावा चढ़ता है.    

कर्नी माता मंदिर, राजस्थान

इस मंदिर में 20,000 काले चूहे रहते हैं जिन्हें पवित्र माना जाता है. श्रद्धालुओं द्वारा लाए गए प्रसाद और चढ़ावे को भी इन चूहों को खिलाया जाता है. यहां आने वाले भक्तों को चूहों के थूक से सना प्रसाद दिया जाता है. लोग मानते हैं कि इस प्रसाद के सेवन से जीवन में सुख और समृद्धि आती है.

शहीद बाबा निहाल सिंह गुरुद्वारा, जालंधर 

इस गुरुद्वारे को लोग एयरप्लेन गुरुद्वारे और हवाई जहाज़ गुरुद्वारे के तौर पर भी जानते हैं. दरअसल यहां आने वाले श्रद्धालु खिलौने वाले एयरप्लेन्स को चढ़ावे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. इनका मानना है कि इस दिलचस्प चढ़ावे से उनके वीज़ा अप्रूवल में दिक्कतें नहीं आएंगी और इन लोगों का विदेश जाने का सपना पूरा होगा. यही वजह है कि इस गुरुद्वारे के बाहर कई दुकानों में खिलौने वाले विमान नज़र आ जाएंगे. 

पनाकला नरसिम्हा मंदिर, आंध्र प्रदेश 

इस मंदिर में भगवान विष्णु की एक प्रतिमा नरसिंह के अवतार में स्थित है. प्राचीन परंपरा के तहत इस प्रतिमा के मुंह में गुड़ का पानी भरा जाता है. ऐसा माना जाता है कि पेट भर जाने की स्थिति में मूर्ति के मुंह से आधा पानी बाहर आने लगता है और इसी पानी को फिर श्रद्धालुओं में प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है.

काल भैरव नाथ मंदिर, उज्जैन 

उज्जैन शहर के प्रमुख देवताओं में शुमार काल भैरव नाथ पर रोज़ वाइन की बोतलें चढ़ाई जाती हैं. ज़ाहिर है, यहां आने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद के तौर पर भी वाइन की बोतलें ही मिलती हैं. मंदिर के बाहर पूरे साल अलग-अलग तरह की वाइन की दुकानें खुली रहती हैं. इस मंदिर का निर्माण मराठा काल में हुआ था.

ब्रह्म बाबा मंदिर : उत्तर प्रदेश

यूपी के इस मंदिर की कहानी अपने आप में भारत की विभिन्न संस्कृतियों का अनूठा उदाहरण है. अपनी कामना पूरी होने पर पारंपरिक चढ़ावों की जगह लोग यहां घड़ियां दान करते हैं. खास बात ये है कि इस मंदिर में हर धर्म के लोग पहुंचते हैं. मन्नत पूरी होने पर हर इंसान यहां घड़ी का चढ़ावा ही चढ़ाता है.

शिव मंदिर, केरल

इस मंदिर के प्रशासन का मानना है कि भगवान का मानवता को सबसे बड़ा वरदान, ज्ञान है. लोगों में इस वरदान को फ़ैलाना चाहिए. यही कारण है कि यहां विभिन्न तरह की किताबों, सीडी और एकेडमिक पेपर्स को प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है. 

मुरुगन मंदिर, तमिलनाडु

पलानी हिल्स में स्थित ये मंदिर अपने अनोखे किस्म के प्रसाद के लिए जाना जाता है. यहां प्रसाद और चढ़ावे के तौर पर पारंपरिक मिष्ठान नहीं बल्कि गुड़ और शुगर कैंडी से बने जैम का इस्तेमाल किया जाता है. इस पवित्र जैम को पंचअमृतम कहा जाता है. इस मंदिर के पास ही एक प्लांट भी स्थित है जहां इस जैम का निर्माण होता है.

खबीस बाबा मंदिर, लखनऊ

Source: Theplaidzebra

लखनऊ से 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित खबीस बाबा मंदिर इस मायने में खास है कि यहां न तो कोई मूर्ति है और न ही कोई पुजारी मौजूद है. यहां महज एक वेदी मौजूद है जिसका इस्तेमाल सामग्रियों को रखने वाले टेबल की तरह होता है. श्रद्धालु इस वेदी पर शराब का चढ़ावा चढ़ाते हैं. माना जाता है कि 150 साल पहले यहां एक रहस्यमयी संत रहा करते थे. यहां आने वाले भक्त इस संत को श्रद्धा से देखते हैं और उनके लिए ये चढ़ावा आता है. इन भक्तों को भी यहां चढ़ावे की शराब का कुछ हिस्सा प्रसाद के तौर पर मिलता है.