रियलिटी शोज़ और अवॉर्ड फंक्शन में आप सब ने जावेद अख़्तर को उर्दू के भारी-भारी लफ़्ज़ों को लोगों के बीच फेंकते हुए देखा होगा. कई बार उर्दू के ये लफ़्ज़ इतने भारी हो जाते हैं कि इन का अर्थ न समझने में ही हम अपनी भलाई समझते हैं. वैसे जावेद अख़्तर बॉलीवुड में एक जाना-पहचाना नाम है, जो कई सालों तक सलीम खान के साथ मिल कर शोले, दिवार जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों की कहानी और संवाद लिख चुके हैं. हालांकि बॉलीवुड को कई बेहतरीन फ़िल्में देने के बाद इस जोड़ी की राहें अलग हो गई, पर दोनों का लिखना बदस्तूर जारी रहा. जावेद साहब लिखने के मामले में सलीम खान से थोड़ा आगे निकल गये, जिसकी वजह थी फ़िल्मों के साथ-साथ उनका साहित्य प्रेम.

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अगर उनके बारे में खुद से कुछ कहना चाहूं, तो मेरे शब्द कुछ ऐसी दुनिया गढ़ते हैं कि:

मैंने फ़राज़ को नहीं देखा
मैंने मीर को नहीं देखा
पर उसके ज़रिये मैंने
ग़ालिब को देखा और
खुसरो को देखा
इन सब के अलावा
उसे जब भी देखा
वैसा ही देखा
रंग-बिरंगे कुर्तों को
उसकी शख्सियत गढ़ते देखा
ख़ामोशी-से कभी उसे
खुद में
टूटते देखा,
कभी बनते देखा
कभी सपनों के दौराहे पर
उसे भूख से लड़ते देखा
सुनसान काली रातों में
कभी उसे चीखते देखा
उसे जब भी देखा
वैसा ही देखा

आज तक सिर्फ़ मैं ही नहीं, बल्कि मुझ जैसे ज़्यादातर लोग जावेद साहब को एक स्क्रीनप्ले राइटर के रूप में पहचानते रहे हैं, जो कई फ़िल्मों के डॉयलोग लिखने के साथ ही, कुछ अच्छी फ़िल्मों के गाने भी लिख चुके हैं. जिस तरह से किसी फंक्शन में ये बंदा शेर कहता है, उससे इस बात का भी अंदाज़ा होता है इसे शेर-ओ-शायरी का भी शौक है.

हालांकि जावेद अख़्तर अपने आप में एक ऐसी शख़्सियत है, जिनके लफ़्ज़ों से आज भी उर्दू की वही खुशबू आती है, जो पुरानी दिल्ली से गुज़रते हुए आपकी सांसों में बस जाती है. वो पुरानी दिल्ली, जिसकी किसी गली के मोड़ पर 'जोक' पनवाड़ी से बातें करता हुआ दिखाई देता है, तो किसी चौराहे पर 'ग़ालिब' दूर किसी को ख़त लिखता हुआ जान पड़ता है. उर्दू की कुछ ऐसी ही खूबसूरत सदियों को अपने आप में समेटे हुए हैं जावेद अख़्तर.

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जावेद अख़्तर को सुनना तो बड़ी ही बात है, पर उन्हें पढ़ कर उन्हें और भी करीब से जानना, इससे बड़ी ख़ुशनसीबी है. उन्हें पढ़ने के बाद एक बात तो साफ़-साफ़ समझ में आती है कि आज के शायरों में शायद जावेद अख़्तर ही एकलौते ऐसे शायर हैं, जो आज भी उस परम्परा को ज़िंदा किये हुए हैं, जिसकी नीवं कभी फैज़ और साहिर जैसे शायरों की विद्रोही प्रवृत्ति ने रखी थी. यानि एक राइटर से ज़्यादा उनके अंदर एक ऐसा शख़्स नज़र आता है, जो हाथ में क्रांति की मशाल लेकर चल रहा हो और मजदूरों की आवाज़ बन रहा हो.

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अगर इस क्रांति और विरोधी प्रवृत्ति वाले शख़्स की झलक हमें जावेद साहब के भीतर देखने को मिलती है, तो इसके पीछे उनकी परवरिश और माता-पिता का बड़ा हाथ रहा है. प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता और प्रगतिशील शायर, जान निसार अख़्तर और मशहूर उर्दु लेखिका तथा शिक्षिका साफ़िया अख़्तर के लाल सलाम का ही नतीज़ा था कि जावेद साहब को कम्युनिस्ट होने के असल मायने बचपन से ही पता थे. जब बच्चे पंचतन्त्र की कहानियां पढ़ रहे होते हैं, उस उम्र में जावेद साहब 'चे' के किस्सों और 'मार्क्स' के सिद्धांतों की बातें किया करते थे. 'ज़ेरे-लब साफ़िया' में साफ़िया अख़्तर अपने पति को ख़त लिखते हुए जावेद साहब की इस उपलब्धि के बारे में कहती हैं कि 'आप जिस सवेरे के लिए लड़ रहे हैं, उसका लाल भविष्य मुझे जादू के रूप में बहुत सुंदर दिखाई दे रहा है.'

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पर जावेद साहब के अंदर का कॉमरेड उस कॉमरेड से बहुत अलग था, जो रैलियों में सड़क के किसी चौराहे पर हाथों में डपली लेकर 15-20 साथियों के साथ खड़े हो कर 'लाल सलाम', 'लाल सलाम' चिल्लाते रहते हैं. बल्कि ये वो कॉमरेड था, जिसकी चिंगारी उस समय ही सुलग चुकी थी, जब बचपन में पिता, मां और बच्चों को छोड़ कर क्रांति की राह पर निकल गया था.

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जावेद साहब अपनी ज़िन्दगी के सफ़र के बारे में 'तरकश' किताब में कुछ यूं बयां करते हैं कि

"मैं किस शहर को अपना कहूं? पैदा होने का जुर्म किया ग्वालियर में, लेकिन होश संभाला लखनऊ में, पहली बार होश खोया अलीगढ़ में, फिर भोपाल में रह कर कुछ होशियार हुआ लेकिन बम्बई आकर काफ़ी दिनों तक होश ठिकाने रहे."

शायद यही वजह है जावेद साहब की ग़ज़लें कभी माशूका को अजंता की गुफाओं में तलाशती हैं, तो कभी उस कमरे को याद करती हैं, जो मुफ़लिसी के दिनों में जावेद साहब का साथी बना. इसके बारे में जावेद साहब कुछ यूं कहते हैं कि:

वो कमरा याद आता है
मै जब भी ज़िन्दगी की
चिलचिलाती धूप मे तपकर
मैं जब भी दूसरों के और
खुद के झूठ से थक कर
मैं सबसे लड़के और खुद से हार के
जब भी उस एक कमरे में जाता था
वो हलके और गहरे कत्थई रंगों का एक कमरा
वो बेहद मेहरबां कमरा
जो अपनी नर्म मुट्ठी में
मुझे ऐसे छुपा लेता था
जैसे कोई मां बच्चे को आंचल में छुपा ले
और प्यार से डांटे
ये क्या आदत है?
जलती दोपहर में मारे-मारे घूमते हो तुम
वो कमरा याद आता है

जावेद साहब को घर से विरासत के रूप में सिर्फ़ दो चीज़ें मिली, एक उर्दू और दूसरी वो विद्रोही शख़्सियत, जिसकी वजह से पर्दे पर अमिताभ बच्चन जैसे एंग्री यंग मेन के किरदार का जन्म हुआ. ये एंग्री यंग मेन कुछ और नहीं बल्कि वो गुस्सा था, जो एक शायर के दिल के किसी कोने में वर्षों से दबा हुआ था. जिसका दर्द उनकी एक शायरी में कुछ ऐसे झलकता है.

ऊंची इमारतों से मकां मेरा घिर गया
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गये

कई फिल्मों की कहानी लिख चुके जावेद साहब की खुद निजी ज़िन्दगी भी किसी फ़िल्म से कम नहीं. इस कहानी में लाचारी का प्लॉट है, भुखमरी के सीन हैं. खुदगर्ज़ी की कहानी है और आखिर में वो मंज़िल है, जिसे पाने के ख़्वाब अकसर हमारा फ़िल्मी हीरो देखता है. पिता बेशक एक लाल भविष्य के लिए लड़ रहे थे, पर बेटे को उन्होंने उसकी लाचारी पर छोड़ दिया, जिसकी खाक छानते हुए जावेद साहब मुंबई पहुंचे और अपनी अलग दुनिया बनाने में जुट गये. ऐसा नहीं कि इस हसीन सपने के पूरा होने के बाद जावेद साहब अपने लाल सवेरे के उद्देश्य को भूल गये हों.

राज्यसभा में अपने आखिरी दिन जावेद साहब ने उस उद्देश्य को स्पीच के रूप में दुनिया के सामने रखा, जिसकी मिसालें आज भी नेताओं और उन लोगों को दी जाती हैं, जो देश को बढ़ते हुए देखना चाहते हैं.