पिछले 200 सालों में दुनिया में कई क्रांतिकारी बदलाव आए हैं. यूं तो तकनीक ने मानव की ज़िन्दगी को काफी आसान बनाया है लेकिन बढ़ती आबादी और घटते संसाधनों ने न केवल दुनिया के सबसे वंचित और शोषित वर्ग की तकलीफ बढ़ाई है, बल्कि दुनिया भर के आदिवासी समाज को हाशिये पर ला खड़ा किया है. कई जनजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं.

ऐसे में जिमी नेल्संस इन लुप्त होती प्रजातियों के बारे में एक किताब लिखने जा रहे हैं, जिसमें दुनिया भर के आदिवासी समाज के कल्चर की झलक देखी जा सकती है. दुनिया की इन जनजातियों की दुर्लभ तस्वीरों को जिमी अपने कैमरे में कैद करने में सफल रहे हैं और इनके माध्यम से वे लोगों का ध्यान विभिन्न जनजातियों की परंपराओं और उनके कल्चर की तरफ आकर्षित करना चाहते हैं. जिमी की नई किताब 'बिफोर दे ऑल पास अवे' में इन जनजातियों के बारे में विस्तार से जाना जा सकता है.

जिमी का मानना है कि ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में इन जनजातियों, समाज और प्रजातियों को भी अपने अद्भुत लाइफस्टाइल, दिलचस्प परंपराओं और खास तरह की कला के लिए पहचाना जाना चाहिए. इन लोगों के पास हथियार के रूप में भाला होता है और ये अपनी पारंपरिक पोशाकों को ही महत्व देते हैं.

खास बात यह है कि ये सभी जनजातियां प्रकृति के करीब रहना पसंद करती हैं और बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग, अंधाधुंध व्यापारीकरण और औद्योगिकीकरण के दौर में भी ये जनजातियां किसी भी तरह से अपने कल्चर और परंपराओं में बदलाव लाने के पक्ष में नहीं है. शायद यही कारण है कि इनमें से कई जनजातियों पर लुप्त होने का खतरा मंडराने लगा है.

2011 में ली गई ये तस्वीर राहराह लावा द्वीप की है और इसे जिमी ने अपनी नई किताब में शामिल किया है.

जिमी चाहते हैं कि Perak Ladies Thikse Monastery जैसी जनजातियां भी लोगों को जहन में ज़िंदा रहें. जिमी ने ये तस्वीर 2012 में भारत में ली थी.

इथियोपिया की Dassanech जनजाति का एक सदस्य. ये तस्वीर 2011 में ली गई थी.


केन्या के न्दोतो पर्वत श्रृंखला के पास तस्वीर खिंचवाते Lelesas, Louelen, Lewangu, Lepokodou, Loingu और Nyerere. ये तस्वीर 2010 की है.


इथियोपिया की ओमो वैली में तस्वीर खिंचवाते डेल और लैल. यह तस्वीर 2011 में ली गई थी और दुर्भाग्य से इस जनजाति को बढ़ते औद्योगिकीकरण की वजह से लगभग भुला ही दिया गया है.

प्पुआ न्यू गिनिया में मौजूद हुली विगमैन जनजाति के कुछ सदस्य. ये तस्वीर 2010 में ली गई थी.

2010 में तंजानिया में खींची गई इस तस्वीर में मसाई जनजाति का एक शख़्स सैतोती.


ये तस्वीर Ergalim Altantsogts की है. मंगोलिया, 2011.


नेपाल में 2011 में ली गई ये तस्वीर Wangmo Tangge गांव की है.

तेजी से विकसित होती दुनिया में इन लोगों को लगभग भुला दिया गया है. ये आज भी उसी तरह से जीवन-यापन कर रहे हैं, जिस प्रकार सदियों पूर्व किया करते थे. लेकिन इन्हें प्रकृति से दूर जाकर हमारे बदलावों का हिस्सा बनना मंज़ूर नहीं. लेकिन जिमी नेल्संस की ये कोशिश काफी अच्छी है. इन तस्वीरों के ज़रिए ही सही, कम से कम दुनिया इनके बारे में जान तो सकेगी.

Source: The Sun