25000 साल पुराना है भारतीय करेंसी का इतिहास. तब से लेकर आज तक इसने अच्छे-बुरे सारे दौर देखे हैं. फ़िलहाल ये अपने बुरे दौर से गुज़र रही है. बेतहाशा मंहगाई, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में हो रहे बदलाव और फ़ॉरन रिज़र्व के कम होने चलते आज 1 डॉलर की क़ीमत 74 रुपये के बराबर हो चुकी है. ऐसे में शायद ही लोग विश्वास कर पाएं कि कभी 1 डॉलर 1 रुपये के बराबर था.

इसी बात पर क्यों न आज़ादी से लेकर अब तक के रुपये की सफ़र पर एक नज़र डाल ली जाए.

आज़ादी से पहले 1917 में एक रुपया 13 डॉलर के बराबर था.

1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तब रुपया और डॉलर बराबर थे.

1951 में जब पहली पंच-वर्षीय योजना लागू हुई तब एक डॉलर 4 रुपये के बराबर था.

1962 में भारत-चीन युद्ध के कारण भारत की अर्थव्यवस्था डगमगाई और 1 डॉलर 7 रुपये के बराबर हो गया.

1975 में जब आपातकाल लागू हुआ तब एक डॉलर की क़ीमत 8 रुपये थी.

1985 में जब हमारा व्यापार घाटा बढ़ा, तब रुपया एक डॉलर के मुकाबले 12 रुपये के स्तर तक गिर गया था.

1991 में हुए खाड़ी युद्ध और विकास दर कम होने के चलते एक डॉलर की क़ीमत 17.90 रुपये हो गई.

1993 में जब भारत सरकार ने आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाई, तब एक डॉलर के बदले 31 रुपये देने पड़ते थे.

2000-2006 के बीच रुपये में उतार चढ़ाव जारी रहा और इसकी Value 1 डॉलर के मुकाबले 40-48 रुपये थी.

2008 में पूरा विश्व आर्थिक मंदी के चपेट में आ गया. तब रुपया गिरकर 51 के स्तर तक पहुंच गया.

2013 में भारत विदेशी कर्ज़ का बोझ 409 अरब डॉलर हो गया. तब एक डॉलर का एक्सचेंज रेट 65 रुपये के बराबर हो गया था.

2018 में लगातार बढ़ती बेरोज़गारी और अमेरिकी शेयर बाजार में आई मज़बूती ने रुपये की कमर तोड़ दी है. आज एक डॉलर के बदले हमें 74 रुपये देने पड़ रहे हैं.

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