शादी या पार्टी में आपने 'ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं' गाना, तो सुना ही होगा. अगर थोड़ा-बहुत फ़िल्मों के दीवाने हैं, तो आप झट से ये बता देंगे कि ये 'हीर-रांझा' फ़िल्म का गाना है. ये वही फ़िल्म है, जिसकी कहानी के डायलॉग कैफ़ी आज़मी ने लिखे हैं. शायद ये कैफ़ी आज़मी की क़लम का ही कमाल था, जिसने आग हस्र कश्मीरी की तरह ही संवादों को कविताओं के रूप में कहा. 14 जनवरी 1919 को पैदा हुए कैफ़ी की क़लम में हीर को रांझा से मिलाने की ताक़त थी, तो वो मजदूरों का बिगुल बन कर इंक़लाब लाना भी बखूबी जानती थी. आज उनके जन्मदिन के अवसर पर हम उनकी कविताओं की कुछ लाइनें आपके बीच लेकर आये हैं, जिन्हें पढ़ कर आप भी एक बार कैफ़ियात की दुनिया में खो जाना चाहेंगे. 

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