स्कूल के दिनों में न जाने हमने कितनी ही कहानियां पढ़ी होंगी. उनमें से केवल कुछ कहानियां ही हमारी यादों में आज भी ज़िंदा है. ऐसी ही कई कहानियों में एक कहानी उस बच्चे की भी थी, जो पैसों के अभाव में हर सुबह तैर कर नदी पार पढ़ने के लिए जाया करता था. ये उस बच्चे की मेहनत ही थी, जो उसे एक छोटे से गांव से निकाल कर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक ले गई.

अब तक आपको अंदाज़ा हो ही गया होगा कि आज हम भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बारे में बात कर रहे हैं. हालांकि बचपन में पढ़ी इस कहानी को लेकर अब कई तरह के संशय मन में पैदा होते हैं कि क्या सच में लाल बहादुर शास्त्री की कहानी सच थी, या बाकी नेताओं की तरह ही ये कांग्रेस का कोई प्रोपेगंडा था?

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इसे एक इत्तेफ़ाक ही कहिये कि महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिन की तारीख एक ही दिन पड़ती है, खुद शास्त्री जी भी महात्मा गांधी के विचारों से काफी हद तक प्रेरित थे. महात्मा गांधी के आह्वान पर ही शास्त्री जी 16 वर्ष की आयु में पढ़ाई छोड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े.

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यहां से एक ऐसे क्रांतिकारी के सफ़र की शुरुआत हुई, जिसे असल मायने में हम जनता का नेता कह सकते हैं. जनता का नेता इसलिए क्योंकि लाल बहादुर शास्त्री इकलौते ऐसे नेता थे, जिन्हें अपनी तारीफ करने से ज़्यादा अपने आलोचक पसंद थे. वो उन नेताओं के एकदम उलट थे, जो किसी हादसे के होने पर एक-दूसरे पर लीपा-पोती करते हैं और अपना दोष किसी और के सिर पर मढ़ने का प्रयास करते हैं. इसका एक जीता-जगाता उदाहरण 27 नवम्बर 1956 को हुई रेल दुर्घटना थी, जिसके लिए शास्त्री जी ने खुद को जिम्मेदार मानते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया.

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शास्त्री जी की एक और खासियत यह थी कि वो अपना कोई फैसला जनता पर थोपने के बजाय पहले खुद उस पर अमल करते थे. आप शायद भूल गये हों, पर भारत के इतिहास में एक ऐसा समय भी आया है, जब सारा देश अकाल से पीड़ित था. महात्मा गांधी के आदर्शों को मानने वाले शास्त्री जी के पास उस समय अमेरिका से मदद मांगने का द्वार खुला था, पर उन्होंने अमेरिका के सामने हाथ फ़ैलाने के बजाय लोगों से एक दिन का उपवास रखने के लिए कहा, जिससे कि देश में अनाज की कमी न हो. ऐसा कहने से पहले शास्त्री जी ने खुद परिवार समेत उपवास वाले विचार पर अमल किया, जब उन्होंने देखा कि एक दिन के उपवास से कोई शारीरिक कमजोरी नहीं होती और अनाज बच जाता है, तब लोगों से इसके लिए उन्होंने अपील की.

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शास्त्री जी वही नेता हैं, जो खेतों में हल चलाने वाले किसानों को भी जवानों के बराबर सम्मान देते थे, तभी 26 जनवरी 1965 को उन्होंने लाल किले से 'जय जवान जय किसान' का नारा दिया. ये वही समय था जब हिंदुस्तान, पाकिस्तान के साथ एक और जंग लड़ रहा था. ये छोटे कद वाले शास्त्री जी के बड़े इरादों और रणनीति ही परिणाम था कि भारतीय सेना ने पाकिस्तानी फौजों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया था.

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इस हार से बचने के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब ने अमेरिका और रूस के सामने मदद के लिए हाथ फैलाया. अमेरिका और रूस के आह्वान पर शास्त्री जी ताशकंद के लिए रवाना हुए, जहां समझौते के बाद लौटते वक्त रहस्यमई परिस्थितियों में शास्त्री जी का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. हालांकि शास्त्री जी मौत अब भी एक अनसुलझी पहेली है, पर ये एक कड़वा सच है कि शास्त्री जी अब हमारे बीच नहीं.