भारतीय समाज, संस्कृतियों और परम्पराओं के धागों से बुना एक बड़ा ही दिलचस्प ताना-बाना है. यहां ढेरों रंग हैं, कुछ उजले कुछ मैले, लेकिन उनमें एक चीज़ बड़ी ही दिलकश है, वो है हमारा अपनी परम्पराओं से गहरा जुड़ाव. हमने वेदों, पुराणों और उपनिषदों की तमाम बातें पढ़ीं-सुनीं और उन पर लम्बे भाषण दिए, पर शायद ही कोई होगा, जिसने इसके पीछे का मर्म समझने की कोशिश की हो. लेकिन सच तो ये है कि इन परम्पराओं और उपदेशों के पीछे का मर्म ही इसका वास्तविक तत्व है, जिससे हम मुंह मोड़ लेना चाहते हैं.

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता', यानि जहां स्त्रियों की पूजा (सम्मान) होती है, वहां देवताओं का निवास होता है.

हमने इस बात को भली-भांति समझा है और पीढ़ी दर पीढ़ी इस सन्देश को आगे भी बढ़ाया है, लेकिन इसे जीवन में हम कितना उतार पाए हैं, ये सवाल आप खुद से कर सकते हैं. हमने देवी की आराधना तो की, लेकिन देवी स्वरुप औरत की आलोचना और अपमान में कोई कसर नहीं छोड़ी है. हमने मां दुर्गा और देवी काली के सामने दंडवत होकर जीवन भेंट कर दिया, वहीं हमारे इर्द-गिर्द मौजूद देवी स्वरूप औरतों से बलात्कार किया जा रहा है. ये कैसा दोहरा रवैया है इस समाज का, जहां एक तरफ उसे हम देवी मानकर नतमस्तक होते हैं, तो दूसरी तरफ हम उसका दमन करते हैं.

Victoria Krundysheva नामक मुंबई की एक फ़ोटोग्राफ़र ने हमारे सामने 'Lost Indian Goddesses' नाम की फोटो सीरीज के रूप में एक आईना रखा है, जिसमें हमें खुद को देखने और संवारने की ज़रूरत है. उन्होंने हमारी ही सोच को सामने रखकर हमसे कई सवाल किए हैं. आखिर कब तक हम अपने ही सिद्धांतों को यूं ख़ारिज करते रहेंगे?

Victoria का सवाल बेहद सामान्य है. जिस मां काली की हम सब आराधना करते हैं, वो शरीर पर सिर्फ़ मुंड माला पहनती हैं, वो पूजनीय हैं, वो मां हैं, देवी मां हैं, अच्छी बात है. बहुत महान और आध्यात्मिक है हमारी सोच, लेकिन अपनी गर्लफ्रेंड से लोग उम्मीद करते हैं कि वो हर वक्त पूरे कपड़ों में ढंकी रहे. क्रॉप टॉप पहनने पर आप किसी भी लड़की को भला-बुरा कहते हैं, अपनी बेटी से कहते हैं कि वो अपनी बॉडी को लेकर सजग रहा करे. मसला ये है कि देवी स्वरूपा एक लड़की समाज की बुराइयों से लड़ने के बजाय खुद से जूझ रही है.

आप देवी दुर्गा की वंदना करते हैं, उन्हें शक्तिस्वरूपा कहते हैं, लेकिन अपने आस-पास की महिलाओं को अपनी हद में रहने को कहते हैं, आखिर क्यों?

आप घर पर देवी लक्ष्मी का हाथ जोड़कर स्वागत करते हैं, पर अपने घर की बहू कैरियर बना रही, तो आपको अच्छा नहीं लगता. आप बेटी से शादी के बाद जॉब छोड़ने की अपेक्षा करते हैं.

आप स्वर की देवी सरस्वती से ज्ञान और संगीत का वरदान मांगते हैं, लेकिन आपको लड़कियों का रॉक म्यूज़िक बैंड में काम करना पसंद नहीं आता और आर्ट आपके लिए कोई गंभीर प्रोफेशन नहीं है.

शराब का सेवन करने वाली लड़कियों को आप अभद्र कहते हैं, जबकि देवी वारुणी का आपके वेदों में वर्णन है. वारुणी का अर्थ है, मदिरा यानि नशा.

जिन देवियों की आप पूजा करते आ रहे हैं, वे हमारे बीच हर समय हैं. लेकिन हम उनका सम्मान करने के बजाय उन्हें अपमानित करते हैं, परेशान करते हैं, उनका रेप करते हैं और उनसे भेदभाव करते हैं.

आखिर ये कैसी भक्ति है, जहां एक देवी के चरणों में आप सिर रखते हैं, तो दूसरी 'देवी' को कुचल देते हैं? एक देवी है तो दूसरी पीड़िता, एक देवी है तो दूसरी भोग की वस्तु. ये कैसी व्यवस्था है जहां देवियों का अपमान होता है. लोग जब औरत को देखते हैं, तो उसे स्त्री अथवा देवी तो दूर, इन्सान भी नहीं समझते, उनके लिए वो मात्र एक शरीर है, जो उनके जीवन की तमाम अभिलाषाएं पूरी करने के लिए ही है.

आखिर ये दोहरी नीति क्यों है? ये सवाल उन सभी लोगों से है, जो खुद को धर्म और परंपराओं का पोषक बताते हैं, या धर्म के नाम पर लम्बे-चौड़े भाषण देते हैं, लेकिन औरत को दोयम दर्जे का समझते हैं. सवाल हर पिता, हर भाई, हर पति और हर पुरुष से है, जो अपने परिवार की महिलाओं को 'इज्ज़त' से रहने की नसीहत देते हैं. मुझे नहीं पता कि कितने लोग ऐसे हैं, जो देवी को पूजते ही नहीं, बल्कि उनके साक्षात रूप, 'औरत' का सम्मान भी करते हैं.

Source: Victoria Krundysheva photography