हिंदी साहित्य को ज़िंदा रखने में पत्रिकाओं का बहुत योगदान है. बहुत से लोग पत्रिकाओं को पढ़ने के बाद ही किताबों से मिल पाते हैं. हिंदी की पत्रिकाओं में जो सबसे पहले नाम याद आता है वो है "धर्मयुग" का. (हालांकि हर किसी का विचार यहां अलग हो सकता है) पत्रिकाओं का इंतज़ार रहता है पाठकों को. जो लोग पत्रिकाएं पढ़ते हैं उनका एक समय के बाद संपादक से एक रिश्ता बन जाता है. ऐसा लगता है, जैसे कि हाथ में पत्रिका आने के बाद संपादक आपसे बात कर रहा हो. यहां कुछ ऐसी ही हिंदी पत्रिकाओं का ज़िक्र होने जा रहा है, जिन्होंने हिंदी साहित्य की मशाल को जलाने का काम किया है. हालांकि इनमें से कुछ हमारे बीच नहीं हैं (बंद हो चुकी हैं), तो कुछ आज भी प्रकाशित हो रही हैं. गर हिंदी साहित्य को बचाना है, तो ऐसी पत्रिकाओं को पढ़ना होगा. वरना फौरी बातें ही बची रह जायेंगी.

1. धर्मयुग

ये एक साप्ताहिक पत्रिका थी. यह पत्रिका "टाइम्स ऑफ़ इंडिया" ग्रुप द्वारा मुंबई से प्रकाशित होती थी. यह पत्रिका 1949 से लेकर 1993 तक प्रकाशित हुई थी. अपने दौर में यह पत्रिका पत्रकारिता और साहित्य में रूचि रखने वालों की अलख को ज़िंदा रखने का काम बख़ूबी करती थी. आज के बहुतेरे लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी वर्ग से जुड़े लोग शुरुआत में कहीं न कहीं इससे जुड़े रहे थे. पहले इसके संपादक पंडित सत्यकाम विद्यालंकर थे. लेकिन जब इसका संपादकिय विभाग धर्मवीर भारती के पास आया तो इसकी लोकप्रियता बढ़ने लगी. धर्मवीर भारती एक साहित्यकार थे. इन्होंने “गुनाहों के देवता” जैसा उपन्यास लिखने के अलावा "ठंडा लोहा" जैसा कालजयी और संजीदा कविता संग्रह लिखा था. इस पत्रिका के कारण लोगों का विश्वास साहित्य और बुनियादी पत्रकारिता की ओर एक बार फिर से स्थापित हो गया था. आज ये प्रकाशित नहीं होती. इसकी कमी पाठकों को कहीं न कहीं ज़रूर खलती है.

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2. हंस

हिंदी साहित्य के रत्न कहे जाने वाले "मुंशी प्रेमचंद” ने इस पत्रिका को प्रकाशित किया था. इस पत्रिका के संपादक मंडल में महात्मा गांधी भी रह चुके हैं. प्रेमचंद के देहांत के बाद हालांकि पत्रिका का कार्यभार उनके पुत्र अमृतराय ने संभाल लिया था. इसके बाद अनेक वर्षों तक "हंस" का प्रकाशन बंद रहा, फिर आखिरकार साहित्यकार राजेंद्र यादव ने प्रेमचंद के जन्मदिन के दिन ही 31 जुलाई 1986 को अक्षर प्रकाशन के तले इस पत्रिका को पुन: शुरू किया. राजेंद्र यादव का इंतकाल हो चुका है, फिलहाल "हंस" के संपादक संजय सहाय हैं. बीते दिनों "हंस" ने घुसपैठिए नाम से नया कॉलम शुरू किया गया है. इसमें साहित्यकारों की नहीं, बल्कि आमजन की कहानियों को जगह दी जाती है. हिंदी साहित्य में ऐसी पहल लोगों के पढ़ने की क्षमता को बढ़ाने का काम कर रही है.

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3. आलोचना

हिंदी साहित्य में "आलोचना" को स्थापित करने का श्रेय नामवर सिंह को जाता है. आपको बता दें कि "आलोचना" एक त्रैमासिक पत्रिका है एवं इसके प्रधान संपादक नामवर सिंह हैं. इसका संपादन अरुण कमल संभाल रहे हैं. यह पत्रिका हिंदी साहित्य में आलोचना को ज़िंदा रखे हुए है. यह पत्रिका राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा प्रकाशित होती है.

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4. नया ज्ञानोदय

अगस्त 2015 में इस पत्रिका का 150वां अंक आया था. यह साहित्यक पत्रिका नई दिल्ली के भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित की जाती है. पहले इसका संपादन साहित्यकार रवीन्द्र कालिया देखते थे लेकिन उनके इंतकाल के बाद लीलाधर मंडलोई इसके संपादन का कार्यभार संभाल रहे हैं. इस पत्रिका में साहित्य के अलावा संस्कृति विमर्श को लेकर भी लेख छपते हैं.

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5. पाखी

यह मासिक पत्रिका है. इसके संपादक प्रेम भारद्वाज हैं. सिंतबर 2008 से इसका प्रकाशन शुरू हुआ था. इसका लोकार्पण नामवर सिंह ने किया था. आज हिंदी साहित्य के प्रति लोगों की रुचि जगाने का काम "पाखी" बखूबी कर रही है. इंटरनेट पर भी इसका एडिशन समय-समय पर छपता रहता है. हिंदी साहित्य अभी इंटरनेट पर ज़्यादा उपलब्ध नहीं है. "पाखी" के अलावा कुछ गिनी-चुनी पत्रिकाएं ही सोशल मीडिया से अपने आप को जोड़कर काम कर रही हैं. यहां आप इस www.pakhi.in वेबसाइट पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं.

यह पत्रिका "इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसाइटी" द्वारा प्रकाशित की जाती है.

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6. अहा! ज़िंदगी

यह पत्रिका साहित्य, सिनेमा, संस्कृति और कला के अन्य आयामों को थामे चल रही है. यह पत्रिका दैनिक भास्कर समूह द्वारा प्रकाशित की जाती है. आलोक श्रीवास्तव इसके संपादक हैं.

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7. परिकथा

यह पत्रिका द्विमासिक है. इसकी एक खासियत ये है कि इस पत्रिका के तहत बिलकुल नये रचनाकारों को जगह दी जाती है. इसके संपादक शंकर हैं. अपने एक इंटरव्यू में शंकर बता चुके हैं कि सरकार साहित्यक पत्रिकाओं को लेकर गंभीर नहीं है. शंकर की इतनी सी बात ने सारे हिंदी साहित्य में छाई मंदी को बयान कर दिया.

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ना जाने क्या कारण है कि हिंदी की साहित्यक पत्रिकाएं गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही हैं? सुनने में आता है कि प्रकाशन बढ़ते जा रहे हैं. सरकार की आलोचना करो, तो इन पत्रिकाओं को सरकारी विज्ञापन मिलने बंद हो जाते हैं. विज्ञापनों के अलावा पाठकों के सिर पर तो पत्रिका चलने से रही. इसी कारण बहुत सी हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं की सांसें उफ़न रही हैं. मुद्दा गंभीर है. गर अपनी हिंदी को बचाना है तो इन पत्रिकाओं को बचाने का प्रयास करें. इन्हें पढ़ें, इन्हें समझें, इनके साथ बातचीत करें. बहुत से मसले पाठक की बढ़ोत्तरी होने के कारण हल हो सकते हैं. हिंदी साहित्य को बचाने में पाठक को अपनी भागीदारी देनी होगी.