पिछले साल आई Wildlife Institute of India की रिपोर्ट के मुताबिक़, गिर के शेरों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है. इसका श्रेय सरकार को नहीं, बल्कि यहां के वनों में पाई जाने वाली एक जनजाति को जाता है. इसका नाम है मालधारी. इनकी वजह से ही गिर के अभयारण्य को एशियाई शेरों का सुरक्षित घर कहा जाता है. मगर सरकार है इन्हें ही उनके घर से बेघर करने पर अमादा है. आइए जानते हैं कैसे.

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'माल' मतलब धन/संपत्ति या पशुधन और धारी यानि उसे संभालने वाले को ही मालधारी कहा जाता है. इस जनजाति के लोग घुमंतू होते हैं. गुजरात के शुष्क वन इनका घर हैं. ये गाय, भैंस, भेड़-बकरी, ऊंट आदि को पाल कर अपनी जीवन यापन करते हैं. ये जनजाति ही है जिस पर गिर के शेरों का जीवन भी निर्भर है.

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इनके मवेशियों को खाकर ही गिर के शेर ज़िंदा रहते हैं. हैरानी की बात है कि ये समुदाय अपने जानवरों पर शेर द्वारा किये गए हमले का विरोध भी नहीं करता है. मालधारियों की कई पीढ़ियां प्रकृति के विरुद्ध जाकर नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों के साथ जीती आई हैं. इस समुदाय के लोगों के जीवन में विज्ञान छुपा होता है क्योंकि इन्होंने सीमित संसाधनों के साथ जीना सीख लिया है.

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जहां ये रहते हैं, वो इलाका 4 वन्य अभयारण्य के अंतर्गत आता है. यही उनकी परेशानी का कारण हैं. दरअसल, इसी इलाके में ऐशियाई शेर फलते-फूलते हैं. सरकार ने वर्ष 1972 में फ़रमान सुनाया कि इन जंगलों में केवल शेर रहेंगे और इस समुदाय के लोगों के सामने उनके अस्तित्व का ख़तरा उत्पन्न हो गया.

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ये जनजाति आर्थिक रूप से पिछड़ी हुई है और इनको किसी तरह की कोई बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध नहीं है. अब इनके सामने रोज़ी-रोटी का सवाल खड़ा हो गया है. मालधारियों का जीवन जंगल पर ही निर्भर था और अगर उनको जंगल से बेदखल कर दिया गया, तो वो ज़िंदगी से ही बेदखल हो जाएंगे.

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जब सरकार ने इनके सामने विस्थापन की बात रखी थी, तब इनसे कई वादे किए थे, लेकिन कुछ लोगों के जंगल से विस्थापित होने के बाद सरकारी महकमे ने उनकी सुध तक नहीं ली.