किसी भी काम को करने के लिए कड़ी मेहनत, लगन और इच्छाशक्ति की ज़रूरत होती है. समाज की भलाई के लिए आप किसी काम को कितने अच्छे से कर सकते हैं, ये आप पर निर्भर करता है. सफ़लता-असफ़लता हर इंसान की ज़िन्दगी में आती रहती हैं. महिला हो या पुरुष कड़ी मेहनत ही आपको सफ़लता दिलाती है. आज के दौर में महिलाएं वो हर काम कर रही हैं जो एक समय में सिर्फ़ पुरुष ही किया करते थे. आज हम एक ऐसी ही महिला की बात करने जा रहे हैं जिन्होंने छोटी सी उम्र में वो काम कर दिखाया जो एक समय में सिर्फ़ पुरुष ही किया करते थे.

आज हम बात कर रहे हैं शहनाज़ खान की. शहनाज़ मात्र 24 साल की उम्र में मेवात क्षेत्र के ग्रहजन ​​गांव की सरपंच बनी हैं. शहनाज़ सबसे कम उम्र की महिला सरपंच बनी हैं. साथ ही वो मेवात की सबसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी भी हैं. ​​

शहनाज़ मुरादाबाद के तीर्थांकर महावीर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस चौथे वर्ष की छात्रा हैं. पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने अपने गांव की तक़दीर और तस्वीर बदलने की ठान ली थी.

शहनाज़ के दादा 55 साल तक गढ़ाजन के सरपंच थे, लेकिन राजस्थान सरकार की सरपंच उम्मीदवारों के लिए 10वीं कक्षा पास की अनिवार्यता के बाद वो सरपंच का चुनाव नहीं लड़ सके. लेकिन सरपंच बनने के बाद अब शहनाज़ अपने दादाजी की विरासत को आगे बढ़ाएंगी.

बीते सोमवार को सरपंच के रूप में शपथ लेने के बाद शहनाज़ ने कहा, 'मेवात क्षेत्र में लोग अपनी बेटियों को स्कूल नहीं भेजते हैं. एक महिला होने के नाते मैं चाहती हूं कि हर महिला साक्षर बने. मैं सबसे पहले बेटियों की शिक्षा के लिए काम करूंगी ताकि उनको भी समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके. मेरी शिक्षा ही यहां के लोगों के नज़रिये को बदलने का काम करेगी. मैं अपनी पढ़ाई के साथ-साथ ये ज़िम्मेदारी उठाने के लिए भी तैयार हूं.'

समाज में इस तरह के बदलाव ज़रूरी हैं. आज एक पढ़ी-लिखी महिला किसी गांव की मुखिया बनी हैं, तो ये कहीं न कहीं आने वाली पीढ़ी के लिए अच्छा संकेत है. ज़मीनी स्तर पर समस्याओं से जूझ रही महिलाओं की शिक्षा और विकास की जिम्मेदारी हर किसी के बस की बात नहीं है. आज अगर एक पढ़ी-लिखी महिला गांव की सरपंच बनकर इस ओर ध्यान देना चाहती हैं, तो ये कदम राजनीति को एक अलग ही दिशा में ले जाने का काम करेगी.