दिल्ली के बारे में सालों पहले किसी महान शायर ने कहा था कि नीलों तक फैली दिल्ली का ये भी एक तार्रुफ़ है, कुछ अफ़सानों की कब्रें हैं, कुछ कब्रों के अफ़साने हैं. इन्हीं पंक्तियों से दिल्ली की पहचान खुलकर सामने आ जाती है. दिल्ली आ ही गए, तो अब आते हैं हम उस गली में, जिसकी पथरीली सड़कें आपको वहां ले जाती हैं, जहां सफ़ेद लबादा पहने और सिर पर लम्बी टोपी लगाये एक शख़्स आम चूसते हुए उर्दू और फ़ारसी में कुछ ऐसी शायरियां कह रहा है, जिसे आशिक़ों की कौम ज़िंदगी भर याद रखेगी. शायरों की ज़िंदगी कुछ और नहीं, किस्मत का तमाशा होता है.

थी ख़बर गर्म कि ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े
देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ

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ग़ालिब कभी भी दिल्ली के नहीं थे, आगरा में जन्मे इस शायर को दिल्ली ने दिल में जगह तो दी, पर उन्हें उस कमरे में डाल दिया, जहां पहले से ही बदनामी रहा करती थी. अपनी बेगम के पिता के घर रहने वाले घर-जमाई थे ग़ालिब. जैसे ही जवानी में कदम रखा, सिर से उनकी बेग़म जां के पिता का हाथ भी उठ गया, पिता और बाकी रिश्तेदार तो पहले ही खुदा की पाक़ कचहरी में पहुंच चुके थे. जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही मिर्ज़ा को जो साथ मिला, वो साथ था जुए और शराब का. मेरठ की छावनी वाली शराब उन दिनों बस महरौली में मिला करती थी. जैसे ही बादशाह सलामत से उनके ससुर की पेंशन लगती, तो गधे पर लाद लाते महीनों भर के लिए शराब. राशन की फ़िक्र मिर्ज़ा को कभी न थी, उसके लिए साहूकार जो थे. क़र्ज़ मांगते वक़्त मिर्ज़ा कभी नहीं चूके, पर किसी का एहसान लेने में ज़मीं में गड़ जाते थे मिर्ज़ा.

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लावेगी हमारी फाक़ा-मस्ती एक दिन

सबके लिए वक़्त बदलता है, पर ग़ालिब के लिए मिजाज़ बदलता था. अब बादशाह बहादुर शाह गद्दी पर बैठ चुके थे. तब दरबार के खास शायर शेख इब्राहिम ज़ौक़ थे, उन्होंने ग़ालिब का बस नाम ही सुना था, तो कौतूहलवश उन्होंने मिर्ज़ा को भी दरबार-ए-महफ़िल में शरीक़ होने के लिए बुलावा भिजवा दिया. ग़ालिब महफ़िल से बेरंग हो कर लौटे, वजह ये थी कि उनकी शायरी का वजन इतना था कि किसी से उठाये न उठा. ग़ालिब लौट आये बिना किसी उम्मीद के. दिन, महीने और साल बढ़ते गये और साथ ही बढ़ता गया ग़ालिब पर चढ़े क़र्ज़ का सूद. सबसे बड़ी बात ये थी कि इस दौरान ग़ालिब को कभी भी खुदा के घर (काबा) जाने की कुफ्र महसूस नहीं हुई. उन्होंने लिखा था कि

हमको मालूम है ज़न्नत की हकीक़त लेकिन
दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है

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अब आलम ये था कि कोई ग़ालिब की दीवान को कलम देने को तैयार न था. बड़ी मुश्किल से एक दीवान छपी. अब यहां से शुरू हुआ मिर्ज़ा असदुल्लाह खां का ग़ालिब बनना. एक बार हुआ कुछ यूं कि ज़ौक़ साहब ग़ालिब की गली से गुज़र रहे थे, तो ग़ालिब ने उनको देख कर उनके मिजाज़ को नाला करने के इरादे से ऐसा शेर मारा कि ग़ालिब पहुंच गये सीधे जफ़र के दरबार में. ग़ालिब ने कहा था कि 'बना है शाह का मुसाहिब फिरे है इतराता'. अब ग़ालिब को इसी मौके की तलाश थी, जैसे ही शमा-ए-महफ़िल ग़ालिब के सामने लायी गई, ग़ालिब ने मुशायरा जीत लिया और साथ ही पा ली दिल्ली के दिल में जगह. ज़िंदगी भर ग़ालिब लेकिन शराबखोरी और क़र्ज़खोरी से पीछा नहीं छुड़ा पाए.

होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को न जाने
शायर तो वह अच्छा है पर बदनाम बहुत है

ग़ालिब की मिल्कियत का जब बादशाह सलामत को इल्म हुआ, तो उन्होंने ग़ालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का ख़िताब दे डाला. अब ग़ालिब को बादशाह के परिवार की कहानी लिखने को मिल गई. ग़ालिब ने अपने जीवन में प्यार को किस तरह से देखा है, वो तो मुझे नहीं पता, पर इतना ज़रूर पता है कि

हैं और भी दुनिया में सुख़न्वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और

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आज भी कहीं शायरी की बात हो रही हो और आप वहां जाकर किसी शायर का नाम पूछ लें, तो नामों की ये फेहरिस्त मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम के साथ ही शुरू होगी. ये ग़ालिब की शान-ए-मिल्कियत नहीं तो और क्या है कि 21वीं सदी में प्यार में डूबा कोई लड़का ग़ालिब की शायरी पढ़ने लगता है. ग़ालिब ने बहुत पहले ही आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी शख़्सयित बयां कर दी थी.

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
वो हर बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता

आज मैं उन सब लोगों से बस इतना कहना चाहता हूं कि कहीं से आपको कुछ घटिया पंक्तियां मिलती हैं, तो उनमें ग़ालिब जोड़ कर इस महान शायर की बेइज्ज़ती न करें. ग़ालिब की इन खूबसूरत शायरियों और ग़ज़लों के लिए उर्दू, फारसी के साथ ही साथ हिंदी भाषी समाज भी उनका ऋणी है. ग़ालिब को उनकी पुण्यतिथि पर नमन.

ग़ालिब की खूबसूरत गज़लों को सुनिए राहत फ़तेह अली खान की आवाज़ में-