भारत में विभिन्न जाति, धर्म, समुदाय, भाषा और अलग-अलग रहन-सहन होने के बावजूद हमारी एकजुटता ही हमारी सबसे बड़ी ताक़त है. यहां हर धर्म हमें एक-दूसरे के धर्म के प्रति प्यार और सम्मान की सीख देता है. दीपावली के मौक़े पर मुस्लिम हिन्दुओं के साथ दीप जलाते हुए दिख जायेंगे, तो हिन्दू मुस्लिम भाईयों के साथ ईद की ख़ुशियों में शरीक होते हुए दिख जायेंगे.

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भाई-चारे की कुछ ऐसी ही मिसाल उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर निवासी 76 साल के मोहम्मद महमूद ने भी कायम की है. दरअसल, महमूद पिछले तीन दशकों से हर बार कुंभ मेले में आकर अखाड़ों में रहने वाले साधुओं के टेंट को रौशनी से जगमग करने का काम करते हैं. इस नेक काम के कारण महमूद साधुओं के बीच 'लाइट वाले मुल्ला जी' के नाम से मशहूर हैं. हर साधु उन्हें बड़ा प्यार और सम्मान देता है.

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मोहम्मद महमूद मुज़फ़्फ़रनगर में इलेक्ट्रॉनिक की एक दुकान चलाते हैं. इलेक्ट्रीशियन होने के चलते महमूद 1986 से लगातार कुंभ मेले के दौरान 'जूना अखाड़े' के साधुओं के टेंट में बिजली की व्यवस्था करते आ रहे हैं. कुंभ के दौरान जूना अखाड़ा सबसे बड़ा अखाड़ा माना जाता है जिनमें रौशनी करने की जिम्मेदारी महमूद की होती है. इस दौरान अखाड़े का हर साधु उन्हें भी एक साधु ही मानता है.

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'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' से बातचीत के दौरान मोहम्मद महमूद ने कहा-

करीब 33 साल पहले मेरी एक नागा साधु से मुलाक़ात हुई थी. जिनके कहने पर मैं पहली बार कुंभ मेले में आया था. उस वक़्त मैं युवा था तो अखाड़ों के बारे में ज़्यादा जानता नहीं था. धीरे-धीरे में इस वातावरण में ढल गया और तब से लेकर अब तक मैं हर बार यहां आ रहा हूं. जब भी कुंभ नज़दीक आता है जूना अखाड़े के साधु लाइटिंग के काम के लिए मुझे बुला लेते हैं.

'कुंभ के दौरान हर नागा साधु मुझे अपने परिवार की तरह प्यार करता है. उन लोगों से मुझे बहुत सारी अच्छी चीज़ें सीखने को मिलती हैं. वो मुझे नमाज़ पढ़ने के लिए अलग से जगह भी देते हैं और किसी भी तरह का भेदभाव भी नहीं करते. भले ही मुझे यहां से थोड़ा बहुत पैसा मिल जाता है लेकिन इस पवित्र जगह पर आकर सेवा करना मेरे लिए गर्व की बात है'.

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जूना अखाड़े के नागा साधु संगम गिरी का कहना है कि 'मैंने आज तक जितने भी कुम्भ मेले अटेंड किये हैं महमूद को हर बार वहां पाया है. मैं उन्हें कभी भी उनके असली नाम से नहीं पुकारता वो हमारे लिए हमारे प्यारे दोस्त 'मुल्ला जी' हैं'.

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