2004 में आई फ़िल्म 'स्वदेश' ने न केवल शाहरूख खान को एक संवदेनशील एक्टर के तौर पर स्थापित किया था, बल्कि इस फ़िल्म ने आशुतोष गोवारिकर को भी वन फ़िल्म वंडर निर्देशक के टैग से निजात दिलाई थी. एक एनआरआई मोहन भार्गव, जो अमेरिका की बेहतरीन नौकरी छोड़कर अपने गांव वापस आ जाता है. यकीनन अपने देश और अपनी सोसाइटी के लिए कुछ करने का जज़्बा पाले हर इंसान के लिए ये मूवी कई मायनों में सोचने पर मजबूर कर देती है.

लेकिन स्वदेश केवल गोवारिकर की कल्पना का ही हिस्सा नहीं थी लेकिन असल में ये एक एनआरआई कपल अरविंदा पिल्लामारी और रवि कुचिमाची पर आधारित थी. भारत आकर यहां के लोगों के लिए कठिन परिस्थितियों में काम करना और एक कंफ़र्ट भरी ज़िंदगी को लात मारकर देश के सबसे पिछड़े और इग्नोर कर दिए लोगों की ज़िंदगी को बेहतर बना देना. जब-जब इंसानियत से विश्वास उठता है, तब-तब ऐसे लोगों के बारे में जानना दिल को सुकून देता है.

रवि हमेशा से ही देश के कई बुनियादी मुद्दों के साथ जुड़े रहे. उन्होंने 1991 में AID (Association for Indian Development) की शुरूआत की. वो इस दौरान अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलैंड में फ़िजिक्स में पीएचडी कर रहे थे. ये चैरिटी संस्था देश में Sustainable Development को बढ़ावा देती है और पिछले कुछ सालों में अपने शानदार काम से कई अवार्ड जीतने में कामयाब रही है जिसमें टाइम्स ऑफ़ इंडिया का ग्लोबल इंपैक्ट अवार्ड भी शामिल है. वर्तमान में AID के 36 चैप्टर्स हैं और दुनिया में 1000 से ज़्यादा वॉलंटियर्स मौजूद है.

अरविंदा अमेरिका में पली-बढ़ी हैं और AID के साथ 1995 से काम कर रही हैं. रिपोर्ट के अनुसार, अरविंदा और रवि AID में ही मिले थे और वहीं से उन्होंने भारत को बेहतर करने की शुरूआत की थी. इसके बाद से ही वो इस प्रोजेक्ट के कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम कर रही हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कोंसिन में दक्षिण एशिया स्टडीज़ में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के बाद अरविंदा, रवि के साथ भारत लौट आईं. ये साल 1998 था.

बिलगांव, महाराष्ट्र के उदई में एक दूरदराज का गांव है. 4 किलोमीटर में फ़ैले इस गांव में 180 आदिवासी परिवार रहते हैं. बिजली किस चिड़िया का नाम है, आज़ादी के 55 साल बाद भी इस गांव को इस बारे में कुछ पता नहीं था. नेशनल इलेक्ट्रिीसिटी ग्रिड इस गांव से 12 किलोमीटर की दूरी पर था. भारत के मेगा हायडल प्रोजेक्ट की पावर लाइन जो नर्मदा नदी पर बनने वालाा था, उसने भी इन आदिवासी गांवों से दूरी बनाए रखी. गांव इतना दूरदराज था कि यहां से पक्की सड़क की दूरी भी 60 किलोमीटर थी और एक सामान्य कच्ची सड़क 18 किलोमीटर दूर. आप इसी से इस गांव के हालातों का अंदाज़ा लगा सकते हैं.

अरविंदा और रवि ने ध्यान दिया कि 9 मीटर लंबे वॉटरफ़ॉल को बिजली बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. इसी के तहत मई 2002 में बिलगांव प्रोजेक्ट को शुरू किया गया था. जनवरी 2003 तक ये प्रोजेक्ट पूरी तरह से चलने लगा था. 15 किलोवॉट के एक छोटे जनरेटर की मदद से बिलगांव प्रोजेक्ट की शुरूआत हुई और गांव के हर घर को बिजली मिलने लगी. इसके अलावा उन्होंने 'आश्रमशाला' नाम के एक बोर्डिंग स्कूल का भी निर्माण कराया था. इस बोर्डिंग स्कूल में बिलगांव और आस-पास के गांवों के 300 बच्चों के रहने और पढ़ने का इंतज़ाम था.

हालांकि इस प्रोजेक्ट में अरविंद और रवि के अलावा भी कई खास लोग शामिल थे. पीपल स्कूल ऑफ़ एनर्जी के अनिल कुमार और सी जी मधुसूदनन ने इस पूरे प्लान का ब्लूप्रिंट तैयार किया. स्पेशल टरबाइन का निर्माण बेंगलुरू के प्रतिष्ठित IISC कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर ने और इसे कागज़ से हक़ीक़त में उतारने का काम मुंबई के सर्वोदय फ़्रेंडशिप सेंटर और गांव के लोगों ने किया. AID ने इस प्रोजेक्ट में 12 लाख की फ़ंडिग की थी.

देखा जाए तो इस प्रोजेक्ट में पूरा गांव ही शामिल था. इस प्रोजेक्ट का पूरा ढांचा चाहे वो Check डैम हो या टैंक या फिर पावरहाउस, इनके निर्माण में ज़्यादातर गांव के वो मज़दूर शामिल थे, जिन्होंने इस काम के लिए कोई पैसा नहीं लिया।

बिजली आने का मतलब था कि लोग अब पीने के लिए और खेती के लिए पानी अब आसानी से उपलब्ध था. इससे Oil Extraction Unit में भी फ़ायदा हुआ. इसके अलावा बिजली से बच्चों को रात में पढ़ाई की समस्या भी कुछ हद तक दूर हो गई थी. इसके अलावा ये गांव वालों के लिए काफ़ी सस्ता भी साबित हो रहा था. इससे पहले लाइट्स और लैंप जलाने के लिए लोगों के घरों में औसतन 150 रुपये महीना खर्च हो जाया करता था, लेकिन अब ककेवल 20 या 30 रुपये खर्च ही आता.

इस प्रोजेक्ट की सफ़लता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि महाराष्ट्र गवर्नमेंट एनर्जी डेवलेपमेंट एसोसिएशन ने बेलगांव प्रोजेक्ट को आसपास के गांवों में दोहराने की बात कही थी लेकिन जैसा अक्सर सरकारी कामों के साथ होता है, सरकार का ये प्रयास कभी भी पूरा नहीं हो पाया.

लेकिन वक़्त हमेशा एक सा नहीं रहता और इस प्रोजेक्ट के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. इस प्रोजेक्ट के शुरू होने के महज साढ़े तीनों साल बाद अगस्त 2006 में बेलगांव माइक्रोहायड्ल प्रोजेक्ट पूरी तरह से धुल गया और इसका कारण था कि सरदार सरोवर बांध का बैकवॉटर इफ़ेक्ट. इसके अलावा भयंकर बारिश के चलते नर्मदा नदी के आसपास के गांव डूब गए जिसमें बेलगांव भी शामिल था. Sustainable एनर्जी के तौर पर एक मिसाल कायम करने वाला ये गांव देश के लाखों गांवों के लिए प्रेरणा था लेकिन मॉर्डन इंडिया की मार नहीं झेल पाया.

अरविंदा और रवि ने AID के साथ मिलकर कई प्रोजेक्ट्स और मुद्दों पर लड़ना जारी रखा. उन्होंने नर्मदा बचाओ आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी और वे आज भी महाराष्ट्र के आदिवासी कल्चर को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

Source: India Times