बेशक हम किसी से न बोलें, पर रात-दिन हम एक ख़्वाब देखते हैं, जिसे लेकर हमारी खुद से एक शिकायत रहती है कि 'लाख कोशिशों के बावजूद हमारे ये ख़्वाब बस ख़्वाब बन कर ही क्यों रहते हैं?' न जाने क्यों, पर इन अधूरे ख़्वाबों के इर्द-गिर्द ही जैसे हमारी दुनिया सिमट-सी जाती है, जिसे ले कर हमारे ख़्याल कुछ इस ऐसे बन जाते हैं कि अगर ये ख़्वाब पूरे हो जायें, तो जैसे हमें जन्नत मिल जाएगी. आज हम कुछ ऐसे ही लोगों की कहानियां लेकर आये हैं, जिन्होंने दुनिया जहान की कामयाबी हासिल की, पर उनके कुछ ख़्वाब ऐसे रहे, जो ताउम्र पूरे न हो सके.

सआदत हसन मंटो

कॉलेज की लाइब्रेरी हो या कोई बुक शॉप, तब तक अधूरी रहती है जब तक कि उसमें 'मंटो' की कोई किताब न मिले. उर्दू साहित्य को अपनी कहानियों से सजाने वाले मंटो आज भी दुनिया के सबसे बड़े कहानीकारों में से एक गिने जाते हैं. लाहौर से लेकर मुम्बई के किस्सों को कागजों पर समेट कर कहानी का रूप देने वाले मंटो का भी एक ख़्वाब था, जो बस कहानी तक ही सिमट कर रह गया.

दरअसल उनकी हमेशा से एक चाहत थी कि वो कश्मीर जा कर उसकी वादियों में घूमें और आसमान को चूमते पहाड़ों को करीब से देखें, पर जम्मू तक 3 बार जाने के बावजूद कभी कश्मीर न जा पाये.

अमृता प्रीतम

साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम ने जितनी कामयाबी हासिल की,, उतनी शायद ही किसी महिला लेखिका को मिली हो. 'पिंजर', 'धरती-सागर और सिप्पियां' जैसे उपन्यास लिख चुकी अमृता असल में अपनी उस प्रेम कहानी को ही पूरा न लिख सकीं, जिसके सपने वो मशहूर शायर 'साहिर लुधियानवी' की याद में देखा करती थीं. अपनी इस अधूरी-सी प्रेम कहानी का जिक्र अमृता अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में कर चुकी हैं.

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इमरोज

आप जैसे ही अमृता प्रीतम की कहानियों को कुरेदना शुरू करते हैं, उसमें एक परत इमरोज़ के नाम की भी दिखाई देती है. इमरोज़ भले ही अमृता के बेहद करीब रहे और उन्हें अमृता के साथ वक़्त बिताने का मौका भी मिला, पर अमृता को उस रूप में न पा सके, जिस रूप का ख़्वाब इमरोज़ देखा करते थे.

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मक़बूल फ़िदा हुसैन

हिंदुस्तान के सबसे बड़े पेंटरों में से एक M.F. Husian भारत में मॉडर्न आर्ट के जनक कहे जा सकते हैं. उनकी ही कोशिश से हिंदुस्तान में The Progressive Artist Group की शुरुआत हुई थी. कैनवास पर रंग बिखेर कर तस्वीरों का रूप देने वाले मक़बूल की एक पेंटिंग कुछ धार्मिक ठेकेदारों को इतनी बुरी लगी कि उन ठेकेदारों के दवाब में मक़बूल को अपना देश छोड़ कर क़तर जाना पड़ा, जहां उनका देहांत हुआ. पर मक़बूल की हमेशा से ख़्वाहिश थी कि उनकी मौत उनके देश में ही हो.

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सुभाष चंद्र बोस

भारत की आज़ादी का ख़्वाब लिए नेताजी अपनी सरजमीं को छोड़ कर मदद जुटाने के लिए विदेश गए. मदद मिलने के साथ ही जब वो आज़ाद हिन्द का सपना लिए देश को लौट रहे थे तो, रास्ते में ही एक विमान हादसे में उनकी मौत हो गई. हालांकि देश तो आज़ाद हुआ, पर उस रूप में नहीं जिसका ख़्वाब नेताजी ने देखा था.

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