अकसर हमारे घरों में जब भी न्यूज़ पेपर या कॉपी-किताबें पुरानी हो जाती हैं, तो हम उन्हें रद्दी में बेच देते हैं. लेकिन कभी ये समझने की कोशिश नहीं करते कि जिस पेपर को हम रद्दी के भाव बेच रहे हैं वो पेपर आता कहां से है? पेपर बनाने के लिए पेड़ पौधों का इस्तेमाल किया जाता है. तो जाहिर सी बात है इसके लिए हर दिन लाखों पेड़ कटते भी होंगे. पेड़-पौधों के होने से जो थोड़ा बहुत शुद्ध हवा मिलती है अगर वो भी न मिले तो जीना बेहद मुश्किल हो जायेगा. लेकिन आजकल लोगों की सोच 'हमें क्या फ़र्क पड़ता है' वाली हो गई है. हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि अगर धरती पर पेड़-पौधे, जीव-जन्तु हैं, तो ही मनुष्य का अस्तित्व भी है.

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नोएडा की रहने वाली सुधा सिंह 'हमें क्या फ़र्क पड़ता है' सोच रखने वाले लोगों से अलग सोचती हैं. दरअसल, सुधा पुराने न्यूज़ पेपर्स और कॉपी-क़िताबें ख़रीदकर लोगों को पैसे के बदले उसी कीमत के पौधे देती हैं. सुधा की इस नेक पहल के बारे में जानने के बाद अब लोग घरों में पड़ी रद्दी कबाड़ी वाले को बेचने के बजाय उनसे संपर्क करने लगे हैं. फिलहाल सुधा नोएडा के कुछ सेक्टर्स और सोसाइटी से ही पुराने न्यूज़ पेपर कलेक्ट करने का काम कर रही हैं. वो धीरे-धीरे अपनी इस मुहिम को पूरे देश में फैलाना चाहती हैं. सुधा की इस सोच का ये नतीजा निकला कि अब नोएडा और आस-पास के इलाके के लोग रद्दी, कबाड़ वाले को बेचने के बजाय सुधा को दे रहे हैं.

सुधा 'वास्टरूट्स' नाम के एक सामाजिक संस्था के ज़रिये लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का काम कर रही हैं. उन्होंने इस काम को करने के लिए अपनी कॉर्पोरेट की जॉब तक छोड़ दी. सुधा के दिमाग़ में ये आईडिया तब आया जब उसने देखा कि उनकी सोसाइटी के लोगों को महीने भर की ढेर सारी रद्दी पेपर्स के बदले 100-150 रुपये मिल रहे हैं. इसके बाद उन्होंने सोचा कि रद्दी पेपर्स के बदले लोगों को पौधे देने से कम से कम हर रोज़ कटने वाले पेड़ों की भरपाई तो की जा सकेगी, ताकि प्रदूषण की समस्या से बचा जा सके. बस फिर क्या था सुधा अपने इस नेक मकसद के लिए कबाड़ वाली बन गयी.

सुधा ने साल 2016 के मध्य में फ़ेसबुक पर एक पेज बनाकर और कुछ फ़्लेयर्स व पैम्फ्लेट्स के ज़रिये ये काम शुरू किया था. इसके लिए उन्होंने अपने घर की छत पर एक छोटा सा गार्डन बनाया हुआ था. उस वक़्त सुधा अपने एक सहयोगी के साथ अपनी कार के ज़रिये लोगों के घरों से पुराने न्यूज़ पेपर्स कलेक्ट किया करती थीं.

सुधा ने The Better India से बात करते हुए कहा कि 'जब मैं अपना ये आइडिया लेकर लोकल अथॉरिटी के पास गई तो उनकी तरफ़ से कुछ भी अच्छा रेस्पॉन्स नहीं मिला. प्रदूषण की बढ़ती समस्या को देखते हुए मुझे लगता था कि जितना ज़्यादा हो सके अपने आस-पास के इलाक़ों में पेड़-पौधे लगाए जाएं, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था. इसी लिए मेरे दिमाग़ में ये आईडिया आया.'

भारत में तकरीबन 40.7 करोड़ लोग न्यूज़ पेपर पढ़ते हैं. तो अंदाज़ा लगाइये कि एक महीने में इतने घरों से निकलने वाली रद्दी का क्या होता होगा? हमारे देश में 40.7 करोड़ लोग तो सिर्फ़ न्यूज़ पेपर पढ़ते हैं, बाकि काग़ज़ जो सरकारी संस्थानों, स्कूल-कॉलेजों व अन्य जगहों पर इस्तेमाल किया जाता है वो कहां से आता होगा? काग़ज़ बनाने के लिए हर दिन लाखों पेड़ों की कुर्बानी दी जाती है लेकिन हर दिन इतने पेड़ लगाए नहीं जाते.

इस नेक काम के लिए हाल ही में नवरत्न फ़ाउंडेशन ने सुधा को 'श्री एफ़बी निगम मेमोरियल अवॉर्ड' से भी नवाजा.

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