महात्मा गांधी ने जिस स्वच्छ भारत का सपना देखा था, सरकार उसे पूरा करने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही है. आलम ये है कि टेलीविज़न से ले कर अख़बारों के फ्रंट पेज और रोड पर दिखने वाले बोर्ड्स पर भी स्वच्छ भारत का सपना दिखाया जाता है, पर असल में क्या हम इस सपने के पूरा होने की राह पर हैं?

मध्य प्रदेश के छत्तरपुर का एक गांव इसकी अलग कहानी है ही बयां करता है, जहां कुछ महीने पहले ही सरकार ने ही हर घर में टॉयलेट बनाने का दावा किया था. यहां रहने वाले दिनेश यादव के घर पर भी सरकार द्वारा एक टॉयलेट बनवाया गया था, जिसे वो आजकल किचन के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं.

उनके मुताबिक सरपंच जी ने टॉयलेट तो बनवा दिए, पर उसका सेप्टिक टैंक बनवाना शायद भूल गये.

इसी ज़िले में एक घर लक्ष्मण कुशवाहा का भी है, जिनके घर पर सरकार ने टॉयलेट बनवाया था. लक्ष्मण के घर सेप्टिक टैंक भी बनाया गया था, पर वो इतना छोटा हो गया कि उसका इस्तेमाल ही नहीं किया जा सकता. इसलिए लक्ष्मण अपने टॉयलेट का इस्तेमाल एक दुकान के रूप में करने लगे.

ये मामला जब ADM छत्तरपुर और CEO ज़िला पंचायत के पास पहुंचा, तो उन्होंने कहा कि

'हम मनाते हैं कि इस स्कीम के अंतर्गत बने टॉयलेट्स को ले कर कुछ शिकायतें आ रही हैं. इस पर जांच के लिए हम कोशिश कर रहे हैं, इसमें जो भी दोषी पाया जायेगा उस पर सख्त कार्यवाही की जाएगी.'

ऐसा पहली बार नहीं है कि जब कागजों पर सरकारी योजनाओं को पूरा दिखा कर पैसे हजम किये गये हों. इससे पहले भी कई योजनाओं में इस तरह की जालसाज़ी सामने आती रही है.