पर्यावरण प्रदूषण आज दुनिया का सबसे बड़ा किलर है. गंदे पानी से लेकर प्रदूषित हवा तक, सब पर्यावरण प्रदूषण के दायरे में आते हैं. इसकी भयावहता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आज युद्ध की हिंसा हो या फिर स्मोकिंग, भुखमरी हो या प्राकृतिक आपदाएं, इन सभी कारणों को पीछे छोड़ते हुए, प्रदूषण दुनिया में मौत का आज सबसे बड़ा कारण है. ये एड्स, टीबी और मलेरिया से होने वाली मौतों से भी तीन गुना ज़्यादा है.

2015 में दुनिया में 6 में से एक मौत प्रदूषण के चलते हुई है. 90 लाख यानि लगभग आधी दिल्ली का पर्यावरण के प्रदूषण के चलते सफ़ाया हो गया. गुरूवार को जारी हुई The Lancet Medical Journal की एक अहम रिपोर्ट सामने आई है. यही नहीं प्रदूषण से होने वाली मौतों और बीमारियों की वजह से ग्लोबल इकोनॉमी का 6.2 परसेंट हिस्सा यानि 4.6 ट्रिलियन डॉलर्स का आर्थिक नुकसान भी दुनिया को हुआ है.

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इस रिपोर्ट के प्रमुख लेखक और न्यूयॉर्क के Icahn स्कूल ऑफ़ मेडीसिन के डीन ऑफ़ ग्लोबल हेल्थ फिलिप लैंड्रीगेन का कहना था कि 'प्रदूषण को लेकर काफी रिसर्च हुई है लेकिन इसे कभी उस तरह का स्तर या अटेंशन नहीं मिल पाया जितना एड्स या फिर क्लाइमेट चेंज को मिल रहा है. प्रदूषण एक बहुत बड़ी समस्या है और लोग ये बात समझ नहीं रहे हैं क्योंकि नुकसान के चलते आंकड़ों का बिखराव शायद गंभीरता कम कर रहा है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि ये एक ग्लोबल समस्या बन चुका है. ये पहली ऐसी रिपोर्ट है जो हर तरह के प्रदूषण से होने वाली मौतों के आंकड़े पर काम कर रही है.'

इस स्टडी के मुताबिक, 2015 में 25 लाख लोगों की मौत के साथ ही भारत इस मामले में टॉप पर है. वहीं चीन में ये आंकड़ा 18 लाख था. बांग्लादेश, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया, दक्षिण सूडान और हैती जैसे देशों में भी वहां होने वाली मौतों का 1/5 हिस्सा प्रदूषण के ही हिस्से आता है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में सबसे ज़्यादा मौत (65 लाख) वायु प्रदूषण के चलते हुई वहीं पानी के प्रदूषण के चलते 18 लाख लोग मरे.

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अपने इस आंकड़ें तक पहुंचने के लिए इस स्टडी के लेखक अमेरिकी एनवॉयरमेंट प्रोटेक्शन एजेंसी के तरीकों का इस्तेमाल और ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिज़ीस के डाटा का इस्तेमाल किया. जहां प्रदूषण से 90 लाख मौतें हुई, वहीं हाई सोडियम डाइट से 41 लाख, मोटापे से 40 लाख, शराब से 23 लाख और सड़क दुर्घटनाओं व कुपोषण से 14-14 लाख लोगों की मौत हुई.

इस स्टडी में 40 से ज़्यादा हेल्थ और पर्यावरण लेखक शामिल थे. इन लेखकों में पूर्व एनवॉयरमेंट मिनिस्टर जयराम रमेश और आईआईटी दिल्ली के प्रोफ़ेसर मुकेश खरे भी शामिल थे. ये एक तथ्य है कि दुनिया के सबसे गरीब लोगों को ही सबसे ज़्यादा भुगतना पड़ता है. यहां भी कुछ ऐसा ही है. प्रदूषण के चलते 92 प्रतिशत मौत मिडिल क्लास या लोअर मिडिल क्लास डेवलपिंग देशों में ही हुई है. यहां ज़्यादातर पॉलिसी मेकर्स का मुख्य मकसद इकोनॉमी को आगे ले जाने और एक बेसिक इंफ़्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए होता है. ऐसे में इन देशों में पर्यावरण से जुड़े कानून कमज़ोर होते हैं और कई इंडस्ट्रीज़ भी पुरानी और प्रदूषित तकनीकों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करती हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, विकसित देशों में यूं तो स्तर कम होता है लेकिन यहां भी पर्यावरण के प्रदूषण से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या लोअर मिडिल क्लास ही होते हैं.

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'लोग ये बात नहीं समझ पाते हैं कि प्रदूषण की वजह से देश की इकोनॉमी पर भी असर पड़ता है. जो लोग बीमार हैं या मर चुके हैं, आखिर वो कैसे इकोनॉमी के लिए अपनी सेवाएं दे सकते हैं? लोगों की ज़्यादा से ज़्यादा सहायता की जानी चाहिए ताकि वे अपने काम धंधे पर जाकर इकोनॉमी में हाथ बंटा सकें' ग्लोबल टॉक्सिक वॉचडॉग प्योर अर्थ के हेड रिचर्ड फ्यूलर ने ये बात कही. उन्होंने कहा कि आज भी एक मिथ को कई आर्थिक मंत्री फ़ॉलो करते हैं. डेवलेपमेंट करनी है तो इंडस्ट्री प्रदूषण तो होगा है. लेकिन ये बिल्कुल गलत है और सच नहीं है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, 1970 में अमेरिका में कॉन्ग्रेस ने क्लीन एयर एक्ट के तहत, वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए अगर एक डॉलर खर्च किया तो उसे 30 डॉलर्स का फ़ायदा पहुंचा. यूएस सेंटर्स फॉर डिसिस कंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, 1980 से गैसोलिन से Lead हटा लेने के बाद से अमेरिकी इकोनॉमी को 6 ट्रिलियन डॉलर्स का फ़ायदा भी पहुंचा है. हालांकि कुछ विशेषज्ञ इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

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अप्रैल में विश्व बैंक ने दावा किया था कि प्रदूषण को हर स्तर पर घटाने की कोशिश एक ग्लोबल प्राथमिकता होगी. दिसंबर में यूएन प्रदूषण के मुद्दे पर अपनी सबसे पहली कॉन्फ़्रेंस भी करने जा रहा है. विश्व बैंक के प्रमुख पर्यावरण विशेषज्ञ Ernesto Sanchez-Triana ने कहा कि प्रदूषण और गरीबी का रिश्ता बेहद साफ़ है और प्रदूषण कंट्रोल होने पर कई दूसरी अहम चीज़ों पर ध्यान दे सकेंगे जिनमें कुपोषण और ग्लोबल वॉर्मिंग जैसे मुद्दे शामिल हैं. अब समय आ गया है कि हम इन समस्याओं को हल्के में नहीं ले सकते हैं वर्ना चीज़ें काबू से बाहर हो सकती हैं.

हेल्थ मिनिस्ट्री के एक सदस्य डॉ संदीप साल्वी ने इस रिपोर्ट को बेहद अहम बताया और कहा कि ये वक्त वाकई जागने का है और पारंपरिक तरीको की जगह हमें प्रदूषण की रोकथाम के लिए सख़्त कदम उठाने की ज़रूरत है वर्ना एक उभरती इकोनॉमी आम आदमी की मौत का कारण बन सकती है.

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