इंसान आसानी से झूठा हंस तो सकता है, लेकिन बिना बात के आंसुओं से रोना लगभग नामुमकिन ही होता है. अगर आपसे कोई कहे कि अब रोने लगो, तो शायद आपके लिए ऐसा कर पाना संभव नहीं होगा. लेकिन दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जिनका प्रोफ़ेशन ही रोना है.

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इन लोगों को रुदाली कहा जाता है, ये बिना किसी वजह के रो सकते हैं. अनजान लोगों की मृत्यु पर इन्हें ऐसा रुदन करना होता है कि देखने वालों की आंखों में भी आंसू आ जायें. ऐसा करने के लिए इन्हें पैसे दिए जाते हैं. पुराने समय में किसी के मरने पर रुदालियों को बुलाना, एक परंपरा थी, लेकिन अब ये परंपरा कहीं लुप्त सी हो गयी है. इसके ख़त्म होने से रुदाली भी अब दूसरे पेशों को अपनाने लगे हैं.

इन्हें बुलाने के पीछे कई सामजिक और मनोवैज्ञानिक कारण होते थे, जिनके बारे में लोग नहीं जानते. इसलिए इनको बुलाने की परंपरा ख़त्म होती गयी. इन्हें बुलाना इसलिए ज़रूरी होता था क्योंकि मृतक के परिजन कई बार सदमें के कारण रोते नहीं थे और शोक को अपने अन्दर ही दबा कर रखते थे. ऐसा करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है. उबरने की प्रक्रिया में रोने की बहुत एहमियत होती है.

रुदाली जब रुदन करते हैं, तो रोने का माहौल सा बन जाता है. जो लोग रो नहीं पा रहे होते हैं, वो भी इन्हें देख रो पड़ते हैं और उनके अन्दर का दर्द बाहर निकल जाता है. आज भी राजस्थान के कई गांवों और कस्बों में ये परंपरा बरक़रार है.

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ये परम्परा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अन्य देशों में भी प्रचलित रही है. ताइवान की ल्यू जिन लिन भी एक रुदाली हैं. ऐसे लोगों की मौत पर शोक व मातम मनाना और रोना उनका पेशा है, जिन्हें न तो वो जानती हैं और न ही कभी उन्हें देखा है. वो ताइवान की सर्वश्रेष्ठ पेशेवर रोने वाली यानी रुदालियों में से एक हैं.

ताइवान में ये माना जाता है कि मृत व्यक्ति के लिए जितना ज़्यादा और तेज़ आवाज़ में शोक मनाया जाएगा, वो ‘दूसरी दुनिया’ में उतनी ही आसानी से जा पायेगा. हालांकि, ताइवान में भी ये परंपरा तेज़ी से ख़त्म हो रही है. इसके पीछे आर्थिक कमज़ोरी और अंतिम संस्कार की लंबी प्रक्रिया से लोगों का दूर होना है.

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चीन में भी पेशेवर ढंग से शोक मनाने की रुदाली परंपरा है. हू सिंगलियान दक्षिण पश्चिम चीन के देहाती इलाकों में इस पेशे से अपनी रोज़ी-रोटी कमा रही हैं. चीन के कुछ हिस्सों में शव को दफ़न किए जाने से पहले देहाती रीति-रिवाज़ों का पालन किया जाता है. शोक मनाने वाले लोगों को किराए पर बुलाया जाता है, ताकि अंतिम यात्रा को शोकपूर्ण बनाया जा सके. वहां रुदालियों को 'कुसांग्रेन' कहा जाता है.

विश्व के अलग-अलग हिस्सों में फैली ये परंपरा भले ही लुप्त होने की कगार पर हो, लेकिन रुदाली बुलाने की प्रथा का मनोवैज्ञानिक महत्त्व रहा है, इस बात को झुटलाया नहीं जा सकता.